छुप जा रे चंदा बदरी में,
कुछ पल छोड़ हमें अकेला....
वर्षों बाद आई है ,
पिया मिलन की बेला......
छुप......
सांसो की कस्तूरी से,
सांसो को महकने दे....
प्रियतम की बाहों में,
कुछ पल तो बहकने दे....
लगने दे अरमानों का,
फिर से कोई मेला........
छुप.........
जिस की छुअन की सिमरन में,
कांप रही हूं वर्षों से........
उसकी उंगली फिरने दे,
प्यासी अधरों के ऊपर से........
लुक-छुप ,लुक-छुप ना कर चंदा,
अब हमसे कोई खेला .....
छुप..........
तेरे सोते ही ,
जाग जाएगी दुनिया .....
फिर फुर्सत के पल ,
मिलेंगे हमें कहां .....
लग जाएगा चारों तरफ,
झूठे रिश्तो का रेला.....
छुप.............
........✍️ पिंकी मिश्रा

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