कुछ ही समय में सब बदल गया। थोड़े महीने पूर्व जो सत्तो खरीद कर लायी हुई औरत समझी जाती, जिसे बारबार नीचा देखना पड़ता, कई बार जिसपर दामिनी और सुरुचि ने हाथ भी उठाया था, जिसकी पवित्रता पर उसके पति फौलाद सिंह को भी विश्वास न था, आज वही सत्तो ठाकुर साहब की हवेली की रानी बनी है। उसकी दोनों जिठानियां उसे बहुत मान देती हैं। अब हवेली में जो भी होता है, वह सत्तो की मर्जी से होता है। जहाँ हवेली की बहुओं के झगड़े गांव की चर्चा का विषय थे, आज उस हवेली में तीन बहुएं नहीं, बल्कि तीन बहनें रहती हैं। दामिनी के बाद सुरुचि के जापे में भी सत्तो का प्रमुख हाथ था। आज गांव का बच्चा बच्चा जानता था कि सत्तो कोई ऐसी वैसी लड़की नहीं है, वह बहुत अच्छी नर्स है। पर गांवों में नर्स को नर्स बोलना उसकी तौहीन करना माना जाता है। गांव की बड़ी बूढी उसे डाक्टरनी बहू बोलतीं तो युवा लड़कियां डाक्टरनी भाभी। सत्तो से सलाह लेने बालों की हमेशा भीड़ रहती। किसी के घर कोई बीमार है तो वह हवेली के दरबाजे से आवाज लगाता
"अरे डाक्टरनी बहू। जरा अपनी चाची को देख लेना।"
सत्तो आवाज लगाती।
"अभी आयी चाचा। देखती हूं कि चाची को क्या हुआ है।"
वैसे गांव में बहुएं बड़े बूढों से बोलती नहीं है। पर यह नियम सत्तो पर लागू न होता। सत्तो पूरे गांव की बहू नहीं, बल्कि बेटी थी। हाॅ इतना जरूर हुआ कि गांव के पुरानी परंपरा के पक्षधर भी अब अपनी पुरानी बातों से हटने लगे। सही बात है कि समय के साथ चलना ही समझदारी है। यदि बहू अपने ससुर से बात करती है तो इसमें परेशानी की क्या बात है। परिवार में सभी को सभी की जरूरत होती है। फिर आपस में बात भी होगी।
सत्तो असीम साहस की द्योतक, स्त्रियों को स्वावलंबन का पाठ पढाने बाली, कभी न थकने बाली लड़की, उसकी जितनी तारीफ की जाये, कम है।
ठाकुर भानुसिंह की इच्छा दो नातियों के जन्म पर भव्य समारोह करने की थी। परिवार में सहमति बनने पर तैयारियां शुरू होने लगीं। दोनों समधियों को निमंत्रण दिया गया। सभी रिश्तेदारों को न्यौता भेजा गया। आस पास के पांच गांवों का झरा न्यौता था। ठाकुर साहब के मिलने बालों की लंबी सूची थी। सभी को निमंत्रण दिया गया। फिर भी ठाकुर साहब को लगता कि कोई छूट रहा है। ऐसा नहीं कि उन्हें याद नहीं आ रहा था। पर वास्तव में वह अभी भी झिझक रहे थे। धर्म और अधर्म के बीच झूल रहे थे। जिस संबंध का आरंभ ही एक अधर्म से हुआ था, आज उनके जीवन का खास संबंध था। फिर धर्म तो यही है कि जब सभी को बुला रहे हैं तो छोटी बहू के घर बालों को भी खबर करनी चाहिये। पर इस साहस का परिणाम सोच शांत रह जाते।
सारी तैयारियों की जिम्मेदारी सत्तो पर थी। सत्तो से रोज ठाकुर साहब बहुत बात करते। पर वास्तव में वह जो बात करना चाहते, कर नहीं पाते ।
अब आयोजन में कुछ ही दिन बचे रह गये। आखिर ठाकुर साहब का सब्र टूट गया।
" बेटी सत्तो। तैयारियों में कोई कमी तो नहीं रह गयी।"
" अब तो सब ठीक है पापा जी।"
" फिर मुझे क्यों लगता है कि कुछ छूट रहा है।"
सत्तो अवाक रह गयी।
" जरा नजदीक बैठो बेटी।"
सत्तो नजदीक बैठ गयी। ठाकुर साहब बहुत देर सोचते रहे। मन के विचारों को जवान पर लाना कठिन हो रहा था।
" बेटी। क्या तुम्हारे माता पिता तुम्हें वास्तव में नहीं अपनायेंगे। मुझे तो लगता है कि वह तुम्हें याद कर रहे हैं। तुम्हें अपनी बहू के रूप में पाकर जब मैं तुमपर विश्वास करने लगा हूं। तो तुम्हारे पिता तुमपर अविश्वास करेंगें। मुझे नहीं लगता। मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पिता कौन हैं। तुम्हारी माता कौन हैं। पर वे जरूर महान हैं। तभी तो उन्हें तुम्हारी जैसी गुणी बेटी मिली है। एक बार अपने पिता से बात कर देख लो। अपनी माता के हालचाल पूछ लो। उन्हें भी आयोजन में बुला लो। "
सत्तो ठाकुर साहब की बातों को विचार करने लगी। मन दुविधा में था। क्या वास्तव में मेरे पिता मेरी याद कर रहे हैं। अथवा मुझे भूल चुके हैं। जब बात सम्मान की आती है तो सभी अपना प्रेम भूल जाते हैं। सर्प के काटते ही तुरंत तेज हथियार से अपना हाथ काट देते हैं।
ठीक है कि ससुर जी बात सत्य हो। पर क्या यह संभव नहीं कि उन्हें पता चलते ही मेरे इस परिवार पर संकट आ जायेगा। वह कैसे स्वीकार करेंगें कि मैं यहाँ खुश हूं। नहीं नहीं। अब यह घर मेरा घर है। ससुर जी मेरे पिता हैं। जेठ जी बड़े भाई तो जिठानियां बड़ी बहन हैं। अपने अतीत के लिये मैं अपने वर्तमान परिवार को तो मुसीबत में नहीं डाल सकती।
उसी समय एक और था जो कुछ सोच रहा था। आखिर जिसपर पूरे गाँव को विश्वास है, उसपर केवल तुझे नहीं। क्या यह लड़की अपवित्र हो सकती है। मान लिया कि दुष्टों के चंगुल में यह अपना सतीत्व न बचा पायी हो। तो क्या इतने मात्र से यह अपवित्र हो गयी। पवित्र तो मन होता है। शरीर तो वैसे भी अनेकों अपवित्र पदार्थो से बना है। रक्त, मांस, विष्ठा, मूत्र, कितनी अपवित्र पदार्थों को धारण करने बाले इस शरीर की पवित्रता भी कैसी। पवित्रता तो मन की होती है। और यह निर्वाध सत्य है कि सत्तो पवित्र है। उसका मन पवित्र है। आज ही सत्तो से अपनी गलती की क्षमा मांगूंगा। उसे अपनी पत्नी का दर्जा दूंगा।
वैसे आज फौलाद सिंह के मन में जो विचार आ रहे हैं, उन्हें उनके पूर्ण कर पाने में कोई संदेह नहीं है। पर शायद वह अभी पूरी बात समझ नहीं पाये। एक स्त्री इतनी आसानी से अपना अपमान भूल नहीं पाती। जैसे एक पुरुष एक स्त्री पर विश्वास करने में समय लगाता है, उसी तरह एक स्त्री भी पुरुष की बात पर विश्वास करने में समय ले सकती है। वह भी सोच सकती है कि पुरुष की वाणी वास्तव में सत्य है या केवल भावनाओं का प्रवाह। श्मशानघाट पर मृतक के सारे संबंधियों के मन में संसार से वैराग्य होता है। पर श्मशान छूटते ही सब पुरानी राह पर आ जाते हैं। फिर पुरुष के विचारों की दृढता जांचना स्त्री का अधिकार है। रही बात कर्तव्य की तो स्त्रियां कर्तव्य को कभी अधूरा नहीं छोड़ती हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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