आँखे बंद करूँ तो तुम नज़र आती हो //
तुम्हारे हास -विहास
भाव -भंगिमा नृत्य करती हैं//
ह्रदय तल में गहरे उतरती जाती हैं //
तुम्हें खोकर ही तुमको पाया...
चित्त तो निर्विकार है...
उस नीरवता को तुम साकार कर जाती हो //
मां अब तुम मेरे अन्तःस्थल में ही रहती हो;
तुम्हारे बोल कर्णपट्टियों से टकराकर
मेरे मन में गूंजती हैं ~
जैसे कहीं दूर से ईश-कीर्तन
गूंजती है सूनी रातों में।
मां अब तूझे कहीं बाहर नहीं
अपने मन में ही टटोलती हं।
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------- डॉ पल्लवी कुमारी"पाम" -----

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