अबला नहीं बेचारी नहीं
मैं नहीं शक्ति से हीन हूँ,
सभी शक्ति के स्रोत हमारे
मैं नहीं कभी भी दीन हूँ।
खुद के खींचे दायरों के
मैं घूम रही चहुँओर हूँ
खुद उलझी उन दायरों में
मैं अनसुलझी सी डोर हूँ।
मैं ही अबला मैं ही सबला
मैं ही साँझ और भोर हूँ।

पुत्री भगिनी भार्या जननी
सबको सीमा में बाँध दिया,
दिग्भ्रमित किया खुद ही खुद को
ये मान कि मैं कमजोर हूँ।
तोड़ दिए यदि दायरे तो फिर
शक्ति का सूरज उदय होगा,
मिटा निराशा का अँधियारा
विजयी आशा की डोर हूँ।
मैं ही अबला मैं ही सबला
मैं ही साँझ और भोर हूँ।

मैं ही रण हूँ मैं ही शान्ती
मैं ही सुसंधि की डोर हूँ,
वरदान और वरदानी मैं
कोमलांगी हूँ कठोर हूँ।
बंधन मैं ही आज़ादी मैं
मैं ही रिश्तों की डोर हूँ,
जब अपने पर आती हूँ तो
मैं तूफानों सा शोर हूँ।
मैं ही अबला मैं ही सबला
मैं ही साँझ और भोर हूँ।
रचनाकार- मालती मिश्रा 'मयंती'