अकेली  ट्रेन  में  गुमसुम  सी,
सफर कर रही थी  वह लड़की।
खिड़की  से  बाहर  देख   रही,
खयालों  में   खोई    हुई - सी।।

हाथ में ली किताब एक  थी,
पन्नों में वह कभी  देख रही।
ध्यान उसका कहीं और  था,
सहमी हुई  वह थी लग रही।।

हिरणी सी थी  उसकी आंखें,
चंचल चितवन नैन  कजरारे।
उड़कर उसकी रेशमी  जुल्फें ,
मुखड़े   पर  उसके  लहराये।।


बैठा  ठीक  सामने  मैं   था,
सोचा क्यों इतनी सहमी  है।
दुविधा उसकी देख रहा  था,
क्यों वह सिमटी डरी हुई  है?

देखा   बैठे    हुए     सामने,
कुछ आवारा से   लड़के थे।
बार - बार  वे   उसे   देखते ,
हरकतें  मवाली- सा करते।।

अभी वक्त  कुछ ही था  बीता।
लड़की  को  मैं  किया  इशारा।
अभिनय का तब दौर चला था,
समझ  गई वह  कहना   मेरा।।



इधर-उधर  की  बातें  करते ,
समय बिताते सफर कर  रहे  ।
खान-पान व हँसी मजाक में ,
निकल गया समय था  कैसे।।

हाल बुरा था उन लड़कों का,
कर न सके वे कुछ मनमानी।
सोचे  होगा  करीबी   रिश्ता,
उनकी लगी  मर गई नानी।।



सफर खत्म हुआ दोनों ही का,,
एक  ही शहर हुआ  दोनों  का ।
एक  -दूसरे  का  ले  हम  पता,
अपना -अपना  रास्ता   नापा।।

एक   सुबह   यूँ    ही  मैं   बैठा,
मुझे  याद  आई   वह   लड़की।
क्या  मुझे  ट्रेन  में  प्यार   हुआ,
मन इतना क्यों विचलित- सी थी?



लेकर एक लड़की का  रिश्ता
सहसा एक दिन  आया कोई ।
बात हुई , हुआ रिश्ता  पक्का,
लड़की ट्रेन वाली ही  निकली।।

अब तो मुझे समझ में आया,
 ट्रेन  में हुआ प्यार उसको।
बड़ी   चालाकी  से   छुपाया,
समझ में नहीं आया मुझको।।
- पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)