हमारे देश में प्यार करना भी गुनाह होता है ,जबकि प्यार ईश्वर की अनुपम भेंट है।

लैला ने मजनूं से प्यार किया ,जुदाई मिली,हीर को रांझे से। फिर भी प्यार का ये सिलसिला थमा नहीं,सदियों सदियों से प्रेमी मिलते हैं ,बिछड़ते हैं।

हमारे भी कहानी के नायक ,नायिका सतत संघर्षों के बाद एक दूसरे को साथ पाने में सफल होते हैं।
यह एक लोककथा है,जिसके पात्र कहानी को थोड़ा रोचक बनाने हेतु बदल दिए गए हैं।

प्राचीन समय में बाल विवाह का प्रचलन जोरों पर था, छोटे उम्र के बच्चों कि शादियां करा दी जाती थी,और गौना अर्थात द्विरागमन सालों बाद होता जब बच्चे युवावस्था में प्रवेश करते।

एक बार की बात है ,पुंगल देश में बहुत बड़ा अकाल पड़ा,राजा हरि अपने परिवार के साथ अपने मित्र राजा के राज्य में गए।
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मित्र ने उनका आदर सत्कार किया।नरवर के राजा का एक पुत्र था,अधिराज,और पुंगल के राजा की एक पुत्री थी,वेदिका।दोनों बहुत छोटे थे,राजकुमार महज 3 साल के और राजकुमारी सिर्फ  2साल की। 
जब पुंगल देश में सब सामान्य हुआ तो सेनापति और मंत्रियों ने राजा को वापस  बुला लिया।
जाते जाते दोनों राजाओं ने अपने रिश्ते को मजबूती देने के लिए,दोनों बच्चों को विवाह कर दिया।
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वेदिका चली गई अपने देश। कुछ वर्षों के बाद नरवर के  राजा की मृत्यु हो गई। राजकुमार युवा हो चुके थे,उन्हें राजसिंहासन पर आसीन किया गया। राजकुमार के स्मृतिपटल से उनके बचपन  का  विवाह गायब हो चुका था।उनका दूसरा विवाह भी हो गया।
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इधर राजकुमारी वेदिका और उनके माता पिता गौने के लिए पत्र भिजवाते लेकिन कोई जवाब न आता।राजकुमारी बहुत सुंदर थी,उसकी सुन्दरता के किस्से दूर दूर तक प्रचलित थे।

फिर पुंगल नरेश ने एक लोकगायक को नरवर देश भेजा ,उसने राजदरबार जाकर राजकुमारी वेदिका की खूबसूरती का अपने गायन के माध्यम से बखान शुरू किया।
अधिराज को सब याद आ गया।
दरबार के बाद ,अधिराज ने लोकगायक को अपने कमरे में बुलाया और राजकुमारी का पूरा हाल पूछा।

गायक ने बताया राजकुमारी की हालत" जल बिन मीन" जैसी है,वो हर वक्त आपकी राह तकती हैं,की आप कब आएंगे उन्हें लेने।

अधिराज की दूसरी पत्नी को ज्ञात था ,वेदिका के बारे में ,इसलिए पुंगल राज्य से जो भी संदेश लाता , वो अधिराज के पास पहुंचने नहीं देती थी।

अधिराज ने पल भर की देरी नहीं कि लोकगायक हनुमंत के साथ पुंगल देश रवाना हुआ।

वहां दोनों मिले,बरसों से सोई मोहब्बत जाग उठी,सूखे उपवन में जैसे बहार आ गई।
दोनों बहुत खुश थे,एक दूसरे के साथ।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

कुछ दिन रह कर अधिराज और वेदिका नरवर राज्य की ओर रवाना हुए।हनुमंत के साथ साथ कई अंगरक्षक भी साथ थे।

रास्ते में वो कुछ देर के लिए ,अचानक एक सर्प आया और उसने अधिराज को डस लिया,अधिराज की मृत्यु हो गई।

वेदिका स्तंभित रह गई,ये कैसी नियति है,ईश्वर बरसों से खोया प्यार जब मिला तो तूने उसे भी छीन लिया।उसके दारुण रुदन से प्रकृति रो पड़ी।
वेदिका चिल्ला रही थी , मैं अभागी ,अब जीकर ही क्या करूंगी, मैं भी आपके साथ इस चिता में सती हो जाऊंगी।

आकाश मार्ग से शिव ,पार्वती जा रहे थे वेदिका t के विलाप सुन उनका  दिल भी द्रवित हो उठा,उन्होंने यक्ष , यक्षणी का रूप धारण किया और अधिराज को जीवित कर दिया।
वेदिका और अधिराज ने उनका धन्यवाद कह आगे की यात्रा प्रारंभ की।
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वे खुशी खुशी आगे बढ़ रहे थे,ये क्या आगे उनका एक और दुर्भाग्य प्रतीक्षा कर रहा था।

सुमेर सिंह को राजकुमारी को दिल ही दिल प्यार करता था,वो किसी भी तरह से अधिराज की हत्या कर वेदिका को अपना बनाना चाहता था।उसने षडयंत्र रचा,रास्ते में उसने अधिराज को रोक लिया,और चिकनी चुपड़ी बातें कर उसे अफीम का सेवन करने कि जिद करने लगा।

सुमेर सिंह के षडयंत्र का पता हनुमंत को लग चुका था ,उसने वेदिका के कान में कुछ कहा।
वेदिका रेगिस्तान की राजकुमारी थी, रेत में पली बढ़ी ,तुरंत ऊंट को दौड़ाया और जल्दी से अधिराज को ऊंट पर बैठा निकल पड़ी।
पीछे से आते अंगरक्षकों ने सुमेर सिंह का काम तमाम कर दिया।
इस प्रकार उनकी प्रेम की परीक्षा खत्म हुई।
नरवर पहुंच कर अधिराज ने अपनी दूसरी पत्नी को मना लिया,और फिर वो सब खुशी खुशी रहने लगे।

प्यार का सुखद अंत हुआ।आज भी लोक कथाओं ने दोनों के  प्यार कि कहानी खूब सुनाई जाती है।
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                    समाप्त