कैसी ये दफ्तर की यारियां ,
बढ़ायें अधिकारी की चिंता।
चार महिला कर्मी हुए जहाँ,
कथानक बनती है साड़ियां।।
कितने की है साड़ी तेरी?
कोटा सिल्क या है चंदेरी?
ये मुझे कांजीवरम साड़ी,
कल मेरे पतिदेव मुझे दी।।
दूजी कहती यह बनारसी ,
पूरे सोलह हजार की है।
पटोला, बंधेज व बोमकई,
मेरे पास हैं सभी साड़ी।।
तभी तीसरी सखी बोल उठी,
टस्सर ,बालूचरी , संबलपुरी।
हकोबा, महेश्वरी, नव्वारी,
मेरे पास हैं सभी साड़ी।।
पुरुष कर्मी भी क्या पीछे हैं ?
उनकी यारी कहीं कम नहीं।
महंगाई औ' फिल्म की बातें ,
दिन भर उनमें चलती रहती।।
पाँच बजे पसरता सन्नाटा,
दफ्तर खाली व काम अधूरा।
अधिकारी यह हाल देखता ,
अपनी किस्मत को ही कोसता।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना हो । सर्वाधिकार सुरक्षित।)
( मुखचित्र गूगल से साभार)

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