भाग दौड़ भरी इस जिंदगी में सोचा,
कुछ फुर्सत के पल अपने लिए भी निकालूं।
रख चुकी दूसरों का ख्याल,
अब एक माला अपने लिए भी बनालूं।।
प्यार और विश्वास की नींव पर,
अपना भी इक आशियाना बनाऊं।
जहां भेदभाव द्वेष और नफरत न हो,
ऐसा एक संसार बसाऊं।।
खुशियों से परिपूर्ण हो मन जहां
इंद्रधनुष से सतरंगी सपने हो।
हो त्याग प्यार संस्कार जहां,
बस प्यार भरे कुछ नगमें हो।।
मान सम्मान परिवार के लिए हो,
लेकिन खुद के सपने भी बरकरार रखूंगी।
बनाउंगी अपने रास्ते खुद ही,
और नए विचारों का अर्जन करुँगी।।
अब न कोई आंधियां दस्तक देगी,
न ही कोई पतझड़ आएगा।
रौशन करुँगी जिंदगी,
अब तो सिर्फ बहारों का मौसम आएगा।।
अंधकार की रात दूर होगी,
इक नई सुबह आएगी।
जो हमारे जीवन में,
नई चेतना का आगाज लाएगी।।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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