भारत माता कराह रही है
राजनीति के जंजीरों में।
देखकर वो भी रो रही है
सरहद पर मरते अपने वीरों को।
जो भी नेता आते हैं वह
स्वार्थ के गुण गाते हैं।
अपना-अपना जेब भरकर
मौन जनता को रुलाते हैं।
स्वार्थी लोभी भरे पड़े हैं
अपना यह भारत में।
देश बने कंगाल इससे
फर्क किसी को ना पड़ता है ।
आधा पेट रह कर बिना वस्त्र के
गरीब जनता सब सड़क पर मरता है।
अपना जेब गर्म करने में
दिन-रात सब मरता है ।
भारत में सुशासन बैठा,
चोर उचक्के बदमाशों के।
भारत माता स्मरण आती
वर्ष के दो दिवसों में।
क्या कोई ऐसा मां का लाला पैदा हुआ नहीं
जो तोड़ सके भारत माता के जंजीरों को ।
भारत माता बैठी रो रही
बंदी बनी अपने घरों में।
फिर से देश बढ़ रहा
गुलामी अंध्यारो में।
अच्छे लोगों को मारे जा रहा है
घुसकर उसके ही घरों में।
भारत माता काराह रही है
राजनीति के जंजीरों में।
स्वरचित एवं मौलिक
सुशील चौधरी
ग्राम + पोस्ट -डीह बुचौली, जंदाहा वैशाली बिहार(844505)

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