शाख के टूटे हुए
 पत्ते न समझो
मैं तुम्हारे जन्म की
 अदभुत कहानी हूँ
ढल चुकी है आज
 वो मेरी जवानी
आने वाला है जो
 तुम पर कल बुढापा
उस बुढ़ापे की मैं 
एक निश्चित निशानी हूँ
खेल कर गोदी में मेरी
था तूने बचपन गुजारा
उंगलियों को थाम कर के
अपने जीवन को सँवारा
मुश्किलों से जब घिरा
तब तूने हमको पुकारा
जब फँसा मजधार में
मैं जब बना तेरा किनारा
 गंगा की तू मौज है 
मैं एक रवानी हूँ
मैं तुम्हारे जन्म की 
अद्भुत कहानी हूँ


✍️✍️आशीष सिंह
Call 112 लखनऊ