ठाकुर भानु सिंह को उनके समधियों ने औकात दिखा दी। आखिर कोई भी पिता कैसे सहन कर सकता है कि उसकी बेटी को ससुराल में प्रताड़ना से गुजरना पड़े। ऐसे मामलों में अक्सर ससुराल बालों को जेल हो जाती है। पर ठाकुर साहब और उनके बेटों को जेल भेजना दामिनी और सुरुचि का उद्देश्य न था। अपमान की अग्नि अपमान करने से ही शीतल होती है। अभी तक गांव बालों के पास जिस बात का प्रमाण न था, वे बातें अब खुलकर हो रही थीं। ठाकुर भानुसिंह की गर्दन शर्म से नीची हो गयी। पर यह समय मान अपमान सोचने का न था। इस समय तो किसी भी तरह के इस मुसीबत से निकल लेना ही समझदारी है। निश्चित ही ठाकुर भानुसिंह समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी युक्तियों ने अपने परिवार के अपयश को बस गांव तक सीमित कर लिया। यदि उनकी रिपोर्ट होती तो फिर तो बात बहुत दूर दूर तक फैलती। उस स्थिति से खुद को और दोनों बेटों को बचा लिया।
समय बदलते देर नहीं लगती। इसी हवेली के आंगन में एक दिन पूर्व ठाकुर भानुसिंह की वाणी गूंज रही थी कि हवेली में हमेशा स्त्रियों ने पुरुषों की आज्ञा मानी है। आज यह हवेली खुद ठाकुरों के पुरुषत्व को चुनौती दे रही थीं। उनपर अट्टहास कर रही थी। हालत ऐसी हो गयी कि ठाकुर साहब को हवेली में घुसने से डर लगने लगा।
किसी समय में पुरुषों के पुरुषत्व का प्रतीक रही अब हवेली महिलाओं की रेसलिंग प्रतियोगिता का मैदान बन गयी। दोनों ठकुरानियों में से कोई भी दूसरे से कम पड़ने को तैयार न थी।कभी लगता कि दामिनी ने सुरुचि को चारों खाने चित्त कर दिया है। तो दूसरे ही क्षण सुरुचि अपनी युक्ति से ऐसी वापसी करती कि यदि वास्तव में रेसलिंग का मैदान होता तो दर्शकों की तालियां जरूर बजतीं।दो महिलाओं के मध्य बर्चस्व की लड़ाई मानसिक और शारीरिक दोनों स्तर पर थी। घर के पुरुषों के पास इन सबको देखकर भी आंख बंद करने के सिबाय कोई चारा न था। अब ठाकुर साहब और उनके बेटों को भी ठेल बाले से पूड़ियां मंगाने में शर्म नहीं लगती। वास्तव में ठाकुर साहव के परिवार के विवाद में सबसे ज्यादा फायदा उसी ठेल बाले का हुआ।
चिकित्सा कर अपना जीवन यापन करने बाले अक्सर ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि उन्हें मरीज मिलते रहें। बकीलों का जीवन भी दूसरों के झगड़ों पर निर्भर करता है। सचमुच दूसरों का दुख भी किसी न किसी की जीविका का आधार बनता है। पूड़ी बाले की इच्छा यही थी कि गांव में हर रोज गांव में कुछ घरों में स्त्रियां रूठें ताकि उसकी दुकानदारी चलती रहे। ठाकुर साहब तो अब उसके नियमित ग्राहक बन चुके थे।
गांव में सभी के लिये यह मन बहलाने का विषय था। मनोरंजन के लिये अक्सर एक दूसरे से लोग ठाकुर साहब के घर की चर्चाएं करते। कुछ जासूसी का दंभ करने बाले युवक रोज नयी चटपटी खबरें परोसतें जिनमें से ज्यादातर तो झूठ ही होता था।
पूरे गांव में एक ही आदमी था जो वास्तव में ठाकुर साहब के दुख से दुखी था। जो ठाकुर साहब की परेशानी दूर करना चाहता था। जिसकी छोटी बुद्धि में भी एक उपाय था जिससे सब बदल सकता है। ठाकुर साहब के घर की प्रतिष्ठा वापस आ सकती है। दोनों बहुएं इस तरह प्रेम से रह सकती हैं कि मानों सगी बहनें हों। तथा घर के काम काज की दिक्कत भी दूर हो सकती है। ठाकुर साहब के दोनों समधी भी खुश रहेंगे। ठाकुर साहब की राजनैतिक महत्वाकांक्षा जिसके लिये उन्होंने ऐसे बड़े परिवारों की लड़कियों को अपनी बहुएं बनाया, भी पूर्ण हो सकती है। और वह आदमी था ठाकुर साहब का नौकर दातादीन।
अनेकों बार बड़ी बड़ी बातें बहुत साधारण लोगों की बुद्धि में आ जाती हैं। पर वह उन्हें कह नहीं पाते। बहुत जरूरत होने पर इशारों में व्यक्त कर देते हैं।
" अरे दातादीन। आजकल क्या सोचता रहता है।"
" कुछ नहीं मालिक। यही सोच रहा था कि दुनिया किस तरह पतन के मार्ग पर जा रही है। धर्म और अधर्म का कोई भेद ही नहीं रहा। मेरा चचेरा भाई है। चालीस का हो गया। विवाह नहीं हुआ। तो एक जबान लड़की खरीद लाया है। राम राम मालिक। ऐसा घोर कलियुग है। "
" तुम भी कुछ भी बोल देते हों दातादीन। लड़की कोई भेंस बकरी तो है नहीं। जो कोई खरीद लेगा। "
दातादीन समझ गया कि मालिक के मन में उत्सुकता आ रही है। वह भी एक चतुर व्याध की तरह दाने डाल रहा था।
" मैं भी नहीं मानता था मालिक। पर हाथ कंगन को आरसी क्या। वास्तव में बहुत से लोग ऐसे पाप करके ही अपनी जीविका चलाते हैं। कुछ प्रेमियों से धोखा खाई तो कुछ अपने नजदीकी रिश्तेदारों से धोखा खाई भी लड़कियां होती हैं। जो बेची जाती हैं। यह धंधा बहुत से राज्यों में फल फूल रहा है। सुना तो यह भी है कि पुलिस का भी हिस्सा होता है। "
थोड़ी देर शांति रही। दातादीन ठाकुर साहब के मन के भावों को ताड़ रहा था।
" मालिक। मैं सोचता हूं कि धर्म और अधर्म की व्याख्या बड़ी कठिन है। खुद भगवान राम ने बाली को धोखे से मारा था। महाभारत के युद्ध में कर्ण का वध भी कौन सा धर्म था। अब कुछ भी रहा हो। पर इन लड़कियों को उनके माता पिता भी स्वीकार नहीं करते। फिर उनका जीवन भी बस जाता है। दूसरी बात यह कि इनमें मायके की कोई अकड़ नहीं होती। फिर घर भी अच्छा सम्हालती हैं। मेरी चाची तो बहू से बहुत खुश हैं। पूरे घर का काम देख लेती है। चाची को तो हाथ भी नहीं लगाने देती। "
ठाकुर भानुसिंह कुछ देर सोचते रहे। फिर अपनी मन की बात धीरे से प्रगट करने लगे।
" कुछ भी हो दातादीन। पर इन लड़कियों की पवित्रता तो संदिग्ध होती है। "
" मालिक। जैसी कीमत, वैसा माल। इस धंधे में तो पवित्रता की बड़ी कीमत है। लड़कियों की पवित्रता बचाकर रखी जाती है। और जिसकी पवित्रता खंडित हो गयी, वह विवाह के लिये बेची नहीं जातीं। अब आपसे क्या कहूं मालिक। आप तो सब समझदार हैं। "
फिर से शांति छा गयी। ठाकुर भानुसिंह को एक रास्ता दिखने लगा। हालांकि ठाकुर साहब धर्म भीरु थे। फिर भी आपदधर्म समझकर उस अधर्म को करने का मन बना रहे थे जिसे अभी भी उनकी आत्मा स्वीकार नहीं कर रही थी। यदि वास्तव में इस तरह खरीदकर किसी लड़की की शादी फौलाद सिंह से करा दी जाये तो सारी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी। जिस लड़की के मायके से कोई उसे स्वीकार करने को तैयार न हो, वह किस के बल पर उछलेगी। वह घर की सारी व्यवस्था भी सम्हालेगी। बार बार मन में पक्ष और विपक्ष आते रहे। अंत में स्वार्थ ने धर्म बुद्धि पर विजय प्राप्त की। अधर्म धर्म का रूप कह कहने लगा कि इसमें अधर्म कहाँ है। जिस लड़की का जीवन पहले ही बिगड़ चुका है, उसे हम सही ही करेंगें। फिर ठाकुर भानुसिंह और दातादीन के मध्य आंखों ही आंखों में बात हुई। और दातादीन मालिक का काम करने के लिये निकल गया। यह काम इतना आसान भी नहीं है। आखिर उसे ऐसी लड़की खरीद कर लानी है जो मालिक की आकांक्षाओं पर खरी उतरे और वह खुद शुद्ध भी हो। पहले से अशुद्ध लड़की मालिक के परिवार के लिये ठीक नहीं है।

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