आँखें कहती है........
उसकी मौहब्बत है........
क्या उसें भी पता है........
कि मुझे उसकी जरूरत है........
लफ्ज़ कहते नहीं मगर
खामोशी में उसकी इकरार है.......
कहती क्यों नहीं वो बात
जिसें सुनने को मेरा दिल बेकरार है........
!...........
हो.........आँखें कहती है.........
!......
!.........
छेड़ जाती है जब भी वो.........
ठहरें हुयें पानी को..........
हाय.... मन को कितना तरसा जाती है.......
बहका जाती गर्म जवानी को.......
मैं कर बैठा हूँ........
इस दिल को उसके नाम.........
जानूं ना आगे क्या......
हो इसका अंजाम.......
!.........
हो.......आँखें कहती है.......
!.......
!.........
अपनी जुल्फो को जब करती है.... वो आजाद
हवाओं में इक नशा सा छा जाता है.......
देखकर फिर उसकी ओर
भला कौन खुद को सम्भाल पाता है.......
हो..... बातें करती है.....
उसकी खामोशी भी.......
!.........
हो....... आँखें कहती है..........
कु. आरती सिरसाट
बुरहानपुर मध्यप्रदेश

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