जीवन एक सरिता- सी है
निरंतर वह बहती रहती है।
रोकें यदि इसके प्रवाह को,
तो वह दूषित हो जाती है।।
आज सुना काशी नगरी में,
धवल गंगा जल हरित हो गया।
कोई समझ न पा रहा इसे,
प्रकृति -कोप या पाप मनुज का।।
भगीरथ प्रयत्न से मिली गंगा,
इसको यूँ ही तुम न गँवाओ।
बड़े भाग से मनुष्य जन्म मिला ,
इसको भी तुम यूँ न गँवाओ।।
दूषित न करो तुम सरिता को,
व्यर्थ पदार्थ बहाकर उसमें।
कलुषित न करो इस जीवन को,
दूषित विचार भरकर मन में।।
यह जीवन इक सरिता जैसी,
इसको बहते ही रहना है।
ज्यों सरिता जीवन है देती,
जीवन जग के निमित्त जीना है।।
जग का कल्याण करती सरिता,
अंत में सागर में मिल जाती।
परहित इस तन से है करना,
जीवन तब ही सार्थक होती ।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है । सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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