वक्त के साथ थमी जिंदगी चलने लगी। दिन ,महीने बीतने लगे। प्रितम को गए हुए तीन महीने हो गए थे।उसी दिन ही मुझे पता चला कि मै दुबारा माँ बनने वाली हूँ। खुशी भी हुई मगर टीस भी उठी अगर आज प्रितम जिंदा होता तो वो आने वाले बच्चे का बड़ा भाई बनता।
जब सबको घर मे मालूम हुआ नन्हा मेहमान आने वाला है।सभी के अंदर मे खुशी कि लहर उठी। लेकिन किसी ने भी इस बार कोई खुशी नहीं जताई सबके मन मे डर बैठ गया था।
छःमहीने बाद मैने अवि को जन्म दिया। धीरे धीरे मै और सभी अवि मे रमणे लगे।
दोपहर का वक्त था मै अवि को लेकर सो रही थी। बादलो कि गड़गड़ाहट सुनकर मेरी नींद खुली। सहसा याद आया छत पर कपड़े सुख रहे है जाकर लेकर आती हूँ वरना कही बरसात आ गई तो सब भींग जाएँगे। मैने अवि को संभाला वो गहरी नींद मे सो रहा था। कही मेरे उठने से उसकी नींद नही खुल जाए इसलिए मैंने उठकर उसके अगल बगल मे तकिया लगाया। बालो को समेटकर जुड़ा बनाया। दबे पाँव से
कमरे से बाहर आ गई।
छत मे पगली हवा जोरो शोरो से चल रही थी। मैंने तार से फटाफट कपड़े उतारने शुरू किया।लेकिन अचानक से मुझे कुछ जलने कि बूँ आने लगी मैनै अपनी नजरे दौड़ाई मगर मुझे कुछ नजर नही आया।
जैसे ही मै कपड़े लेकर जाने के लिए मुड़ी पानी की टंकी के पास मुझे कोई बैठा हुआ नजर आया। चेहरा तो नहीं देख पा रही थी क्योंकि वो पीठ करके बैठा हुआ था थोड़ा गौर से देखी तो मुझे धुएँ के छल्ले हवा मे उड़ते नजर आए। मै कुछ समझ नहीं पा रही थी। मै सोचती हुई उसके तरफ धीरे धीरे कदम बढा रही थी। कौन है वहाँ और क्या कर रहा है??
मै उस इंसान के पास पहुंँचकर देखती हूँ वो चिल्लम
से कश ले रहा था और अपनी नाक से धुएँ के छल्ले उड़ा रहा था और उसकी हथेली मे सफेद रंँग की पाऊडर जैसा कुछ थी वो उसे उठाकर सूँघ रहा था।
मै हतप्रत होकर देख रही थी और डर से काँप भी रही थी। मगर मैनै हिम्मत जुटा करके जोर से बोला "कौन है ??" जैसे ही वह पलटा उसे देखकर मेरी आँखे फटी की फटी रह गई। ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर आसमान गिर गया हो। और मेरे मन मे आया धरती माँ फट जाए मै भी सीता माता के जैसे उसमे समा जाऊँ। मेरे हाथो से एक एक करके सारे कपड़े गिरकर उड़ने लगे।
जानते हो देव "वो कौन था" ??
देव "कौन था प्रिति जी"??
वो और.कोई नही मेरे पति प्रेम जी थे ,जिसे मै अपना भगवान मानती थी। जिस पर मै आँख मिचकर भरोसा करती थी। मेरे विश्वास को मिट्टी मे मिला दिया।
देव "प्रिति जी उसके बाद क्या हुआ??"
उसके बाद,
मै हारी हुई इंँसान की तरह उसके तरफ बढती हूँ। वो नशे मे इतना डूबा हुआ था कि उसे ये भी नहीं पता चल रहा था कि उसकी पत्नी ने आज उसे रँगे हाथो पकड़ लिया है। उसे तो कोई होश ही नही था , वो नशे मे धुत था। और सोनिया सोनिया करके कुछ कुछ बड़बड़ा रहा था। उसकी आँखे जलती हुई लाल अँगारे प्रतीत हो रही थी।
मै उसके करीब जाकर उसके सर्ट के काँलर को पकड़कर गुस्सा से उठाती हूँ , उसके हाथो मे जो पाऊडर था , उसे हाथ से मारकर हवा मे उड़ा देती हूँ। चिल्लम को छीनकर फेंक देती हूँ ।उसके गट्टे को पकड़कर टंकी के पास से घसीट कर बीच छत पर लाकर उससे पूछती हूँ।
कब से चल रहा ये सब??तुम किसका नाम लेकर पुकार रहे थे ?? कौन है सोनिया?? तब तक उसके फोन कि घंटी बजती है। मै उनके जेब से फोन निकालती हूँ । स्क्रीन पर सोनिया का नाम फ्लैश होता है। मै फोन उठाती हूँ। मै बोलती उसके पहले ही सामने से आवाज आती है। "जानू आई लव यू"। तुम आए नहीं ?? मै कब से तेरा इंतजार कर रही हूँ कैफे मे तुमने वादा किया था आज मुझे घूमाने ले जाओगे। आकर देखो मैनै तुम्हारी दी हुई साड़ी पहनी है। मैनै पूछा कौन बोल रही हो ?? मेरी आवाज सुनते ही अजनबी लड़की फोन काट देती है।
मेरे कानो को विश्वास ही नहीं होता है । क्या कमी रह गई थी आखिर मेरे प्यार मे??
मै काँच की तरह टूट कर बिखर जाती हूँ। मेरे हाथो से फोन छूट जाता है और मै धम्म से जमीन मे बैठ जाती हूँ। आँखो के आँसू पोंछकर , अपने आप को संभालते हुए फिर से उठकर उससे पूछती हूँ , ये सब कब से चल रहा है??
मगर उसके मुहँ से एक भी लफ्ज़ नहीं फूटते है ,गुस्सा से मेरा चेहरा तमतमाया हुआ था। मै उनसे बहुत झगड़ा करती हूँ ,मारती हूँ मगर वो अपने दोनो हाथो से अपने सर को पकड़ कर छत कि जमीन पर बैठ जाते है। जी तो कर रहा था ये प्राकृतिक तूफान जो नियती ने चलाया है। ये मुझे भी अपने संग बहाकर ले जाए तो अच्छा है। उनको छत पर छोड़कर ,मै रोती हुई साड़ी के पल्ले से मुहँ पर दबाती हुई भागकर अपने कमरे मे आकर मनु भैया को फोन लगाती हूँ।
प्रेम जी कि सारी करतूतें ,मै भैया को रो रोकर फोन मे सब बताती हूँ। भैया मुझे नहीं जीना है। मै मरना चाहती हूँ। मै मर जाऊँगी , तब तुम अवि को अपना बेटा बना लेना। भैया इन्होंने मेरे साथ विश्वासघात किया है।
मनु भैया " प्रिति सुन.चुप हो जा बहना ,तुम कुछ मत करना ,मै आ रहा हूँ तेरे पास बात करते है न जवाई बाबू से तुझे कोई गलतफहमी हुई होगी।"
मै "नहीं भैया मुझे कोई गलतफहमी नहीं हुई है मैनै अपनी आँखो से देखा है। कानों से सुना है।
मैनै कहा न भैया मै जहर खाकर मर जाऊँगी मगर इस आदमी के साथ नहीं रह सकती"
मै "सुबक सुबक कर रोती जा रही थी ।भैया से कहती रही रही थी।
मुझे नहीं जीना ,मन भर गया मेरा जिंदगी से मुझे मरना है।"
मनु भैया "होश मे आओ ,ऐसा कुछ भी मत करना तुम्हें मेरी कसम है।"
मै "नहीं भैया आज मे कोई कसम नहीं मानने वाली ,
मैंने कहा न आपसे मुझे मरना है अब मुझे कोई रोक नहीं सकता है ..कोई नहीं ...मतलब... कोई नहीं"
मनु भैया "प्रिति रूक जा बहना ऐसा कुछ नहीं करना। भैया तेरा अभी तेरे पास आ रहा है।
तू सुन रही है न"
प्रिति फोन खट से काट देती है
मनु भैया "हैलो प्रिति ....'प्रिति"
मनु भैया रितेश भैया को फोन लगाते है।
कहाँ हो तुम रितेश??
रितेश भैया "मै बाहर आया हुआ था। लेकिन घर मे कुछ पेपर्स छूट गए थे लेने आया हूँ।"
मनु भैया "बाकी सब कहाँ है??"
रितेश भैया "मम्मी और बिट्टू डाक्टर के पास गए है।
मनु भैया "ओह!!!"
मनु भैया " तुम घर पहुँच गए"
रितेश भैया "हाँ भैया बोलिए क्या काम था?"
मनु भैया रितेश भैया को सारी बात बताते है और कहते है ,जब तक मै नहीं आ जाता तुम प्रिति का. ख्याल रखना उसके पास से कही जाना नहीं
मै जल्दी से पहुंँचता हूँ।
रितेश "जी भईया"
रितेश भैया घबराते हुए घर मे दाखिल.होते है
भाभी ..भाभी कहकर मुझे पुकारते है।
मै रसोई घर मे सिसकियाँ लेती हुई तब तक किरासेन तेल अपने ऊपर डाल चुकी होती हूँ। ,माचिस की तलाश कर रही थी मगर मुझे मिल ही नहीं रही थी।मै बकती जा रही थी ..मुझे नहीं जीना कहकर और माचिस ढूढती जा रही थी । तब तक मे रितेश भैया मुझे ढूढते हुए ,भागते हुए किचेन मे आते है।
रितेश किरासेन तेल कि गंध आ रही है। वो मुझे
सूँघ कर देखते है दोनो कंधो को पकड़कर झंकझोर कर मुझे कहते है होश मे आइए भाभी क्या कर रही है आप।
मै रितेश भैया का हाथ हटाकर गुस्से मे कहती हूँ पास मत आईए मेरे ,मै ना कहा न मै जीना नहीं चाहती हूँ
मरना है मुझे , हटिए मेरे सामने से ..मै उन्हें धक्का देती हूँ फिर माचिस ढूढने लग जाती हूँ।
रितेश भैया उठकर फिर मेरे पास आते है। भाभी चलिए बाहर ,बाहर मिलेगी माचिस
मै अपना चेहरा उठाकर उनके चेहरे को गौर से देखती हूँ। रोते रोते बच्चों कि तरह भैया से कहती हूँ सच मे
झूठ नहीं बोल रहे हो न।
भैया ने आँखो से आश्वस्त करके कहा ,मै आपसे झूठ क्यो बोलूंँगा। चलिए किचेन से बाहर चलते है। भैया मेरा हाथ पकड़कर बाहर ले गए।मुझे चेयर मे बिठाया
पंखा चलाया और मै बैठी बैठी बड़बड़ाती हुई कहती जा रही थी भैया मुझे नही जीना मुझे माचिस दिजिए
अभी सारा किस्सा खत्म करती हूँ।
रितेश भैया हाँ भाभी अभी देता हूँ। रितेश भैया की नजरे जैसे ही मनु भैया को आते देखती है वो राहत की साँस लेते है।
मनु भैया को देखते ही मेरा रोना अत्यधिक बढ जाता है। भैया मुझे गले से लगाते है मुझे चुप होने कहते है
कहते है "मै आ गया न सब ठीक कर दूँगा।अभी बात करता हूँ प्रेम बाबू से कहाँ है वो ??"
एकाएक भैया को ध्यान आया प्रिति अवि कहाँ है??
मै "मुझे नहीं मालूम"
मनु भैया "प्रिति होश मे आ बाबू।"
मनु भैया रितेश भैया से कहते है जाओ जल्दी से देखो
कमरे मे व़ो काफी देर से अकेला है।
रितेश भैया हड़बड़कर ऊपर कमरे मे जाते है देखते है
बाबू खूब रो रहा है काफी देर से रोने के कारण उसके होठ सूख गए थे, आँखे रो रोकर क्षुब्ध हो गई थी।
भैया अवि को दौड़कर अपने कलेजे से लगाते है।
उसकी पीठ सहलाते हुए नीचे लेकर आते है
क्रमशः

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