पापा कहाँ जाते है
देह से विलग
आत्मा मे समाये रहते है
जब भी घबराता है मन मेरा
विचारो से हिम्मत भरने
चले आते है ।
मन की आँखो से देख लेती हूँ
जैसे समझाते थे ,समझ लेती हूँ
और मन ही मन हल ढूँढ लेती हूँ
पापा,हर आदत मे ,स्वभाव
झलक आते है ,और पास होने का
आभास करा देते है ।
ये जो लिख रही हूँ लेखनी से मै
ये उन्ही का गुण है जो हमे मिला
वरिष्ठ कवि ,लेखक ,मंच संचालन
सभी खूबियो से सुशोभित थे
भावनाये हमे भी दे दी और
कहते थे ,मेरी याद आये तो मेरी
कविताये तुम पढ लिया करो
भावो से मिलता रहूँगा तुमसे
दूर कहाँ जाऊँगा ....
लेखनी से लिखने का हुनर दे दिया
भावो से मेरा मन ऐसा भर दिया
पता ही नही चलता
कैसे लिख जाती है कविता ...
बस मन मे अपार खुशी दे जाती कविता
जैसे पापा मिलने आ जाते हमसे
मेरे हाथो से भाव सजा जाते हो जैसे
पापा ..कहाँ जाते है ,देह से विलग
आत्मा मे समाये रहते है
पल पल याद रहते है ,अपनी आदतो
मे ,हँसी मे ,चेहरे मे झलक आते है
हौले से मुस्करा जाते है ,और हँसा जाते है ।
मीनाक्षी शर्मा
भोपाल मध्यप्रदेश

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