" कहां जाने की पैकिंग हो रही है ? " कहता हुआ वीरेश अदिति को आकर पीछे से बाहों में भर लेता है ।

मैंने तो तुम्हें बताया था न ! बड़े भैया की बेटी रीवा की छ: दिसंबर को शादी है । तुम इतनी जल्दी भूल जाते हो । हमें भी जाना है शादी में ! उसी की पैकिंग कर रही हूं । 

हमें नहीं जाना है । मैं तो नहीं जा रहा तुम चाहो तो जा सकती हो हमेशा के लिए...... यह कहते हुए वीरेश की पकड़ और लहजा दोनों सख्त हो जाता है ।

अदिति स्वयं को विरेश की पकड़ से मुक्त करा कर कहती है हम क्यों नहीं शादी में जा सकते ? बड़े भैया इतनी शौक से इकलौती बेटी की शादी करवा रहे । उन्होंने सब रिश्तेदारों को बुलाया है । सब आ भी रहे हैं फिर हमें जाने में क्या आपत्ति है ?

क्या आपत्ति है..... यह तुम अच्छी तरह से जानती हो । यह भी कोई शादी हुई । तुम्हारी लाडली भतीजी पिछले पांच वर्षों से उस लड़के के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही है । सुना है पहले ही उन्होंने कोर्ट मैरिज भी कर लिया है । जब सब कुछ हो ही गया है । तो तुम्हारे भाई साहब को इसे सामाजिक जामा पहनाने की क्या जरूरत है । यह सब तो बस दिखावा है । तुम्हारी भतीजी ने जो गुल खिलाएं है । उसे लाख ढंकने की कोशिश करें तुम्हारे भाई साहब ! परंतु हमारा समाज इसे कभी नहीं स्वीकार करेगा । और मैं ऐसे लोगों से कोई रिश्ता -नाता नहीं रखना चाहता । तुम स्वतंत्र हो जिसे चाहे चुन लो मुझे... या अपने भाई साहब को ! यह कहता हुआ विरेश जूते पहनता है और घर से निकल जाता है ।

अदिति निढ़ाल हो कुर्सी पर गिर जाती है । और डूबती चली जाती है विचारों के समंदर में । उसे समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करें । और क्या अपना जीवन साथी अपनी पसंद से चुनना इतना बड़ा अपराध है । जिसकी सजा उसके माता पिता को दी जाए । विरेश आज के जमाने का पढ़ा लिखा व्यक्ति होकर भी इतनी छोटी सोंच रख सकता है । यह तो उसने कभी सोंचा भी नहीं था । वह बार-बार विचार कर रही थी परंतु उसे न रीवा गलत लगती थी । न उसके भाई साहब ! अपना जीवनसाथी चुनने का हक हर इंसान को है । चाहे वह लड़का हो या लड़की । जब तक हम अपना जीवनसाथी अपने अनुसार चुनना तय नहीं करेंगे तब तक दहेज प्रथा जैसी कुप्रथा हमारे समाज से खत्म नहीं होगी । समाज में हर पोस्ट पर कार्यरत लड़कों की कीमत तय है । डॉक्टर है तो तीस लाख , इंजीनियर है तो पच्चीस लाख, बैंक कर्मचारी है तो बीस लाख , क्लर्क है तो पंद्रह लाख, पियून है तो दस लाख इत्यादि । इन कुप्रथाओं पर तो विरेश ने कभी उंगली नहीं उठाया । कभी नहीं कहा कि उसने दहेज लिया है मैं उसके घर शादी समारोह में नहीं जाऊंगा । मुझे ऐसे लोभी लोगों से संबंध नहीं रखना है । और आज जब किसी लड़की ने स्वतंत्र होकर अपना जीवनसाथी चुना है तो उसे इतना एतराज है । वह उठती है और निश्चय करती है कि वह शादी समारोह में जरूर शामिल होगी । और हमेशा रीवा के फैसले का समर्थन करेगी । समेटे हुए सामान से विरेश के कपड़े निकाल देती है । और टैक्सी बुलाकर घर की चाबी और एक चिट्ठी पड़ोसन को सौंप कर चल पड़ती है । अपनी स्वतंत्र विचारों की समर्थन के रास्ते पर ।
         पिंकी मिश्रा