मां स्वाद तेरे खाने सा कहां,
ढूंढ मैं यहां वहां?
मिठास थी,जो में खाने की ,
मुझ में है वह बात कहां
परछाई तो तेरी हूं ,
पर तुझ सी वह बात कहां ?
प्यार से बिठाना, सब को खिलाना
खाना बनाना, वह मेहमान नवाजी,
कहां से लाऊं ,स्वाद बता मां
स्वाद तेरे खाने सा कहां,
ढूंढू मैं यहां वहां।
याद आता है, वह मीठा बनाना
भीनी -भीनी खुशबू ,
प्लेट लेकर हमारा आना ,
बनाती तो सब कुछ मैं भी हूं ,
पर बच्चों में खाने की ललक कहां?
मां स्वाद तेरे खाने से कहां,
पेट तो भरे पर मन ना भरा ,
एक रोटी प्यार से ज्यादा खिलाना,
अब भी लाड़ जताती मां,
जबरदस्ती कुछ ना कुछ खिलाती मां,
प्यार बरबस अपना लुटाती मां।
स्वाद तेरे खाने सा मां ,
ढूंढू मैं तो यहां वहां।
दिल की कलम से
मधु अरोड़ा

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