तोड़ दी गयी कुरीतियों की जंजीरें,
आ गया है नया दौर ये कहता रहा जमाना।
पर क्या आसान है एक महिला के लिए,
अपने वजूद को पाना।।
निर्दोष थी अहिल्या फिर भी,
पत्थर की मूरत बनना पड़ा।
पांच महारथियों की पत्नी द्रोपदी को,
भरी सभा में विवस्त्र होना पड़ा।।
सीता जैसी देवी से भी चरित्र प्रमाणपत्र मांगता रहा जमाना।
पर क्या आसान है.........
छोड़ कर पुत्र और पत्नी को निद्रा में,
निकले थे स्वयं की खोज में भटके थे वन-वन में।
लौटे तो बुद्ध बन चुके थे,
सारे सांसारिक बन्धनों से ऊपर उठ चुके थे।।
इस अवस्था में एक स्त्री को क्या स्वीकारता ये जमाना।
पर क्या आसान है.........
विवाह जैसे पवित्र बंधन में बंध गए,
अपना अंस भी कोख में डाल दिया।
निभाई नही वो जिम्मेदारी,
और बीच मंझधार में छोड़ दिया।।
निभा न सके तुम पिता का फर्ज लेकिन माँ की ममता से अनजान था ये जमाना।
पर क्या आसान है........
लिखा गया है स्वर्णिम अक्षरों में,
इतिहास उन बुद्ध जीवियों का।
भुला दिया गया है त्याग,
शकुंतला और यशोधरा जैसी नारियों का।
पर क्या एक स्त्री को उसका अधिकार दे पाया ये जमाना।
पर क्या आसान है........
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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