सत्तर सावन देख चुके वर्मा जी ने पास रखी छड़ी को देखा।
मन ही सोचने लगे ,उम्र की इस पड़ाव पर सभी साथ छोड़ गए।
बेटे ,बहु तो रिटायर होते ही ,अपना अपना हिस्सा ले चलते बने ।
गठिया सताने लगा ,उठने बैठने में तकलीफ होती तो श्रीमती जी ने बाजार से छड़ी लाकर दी।
दुकानदार ने कहा था_बहनजी सस्ती है,टिकाऊ है ,आपलोगों की जिंदगी निकाल देगी ,शुद्ध सागौन की है।
कुछ सालों में श्रीमती जी भी साथ छोड़ चली गईं।
छड़ी उठाते उन्होंने कहा _अब तो मैं जब तक हूं ,तू ही मेरा साथ निभायेगी।
और चल दिए पार्क की ओर।