फौलाद सिंह रात होने का इंतजार कर रहा था। दुनिया की नजरों में दोनों रात में साथ साथ सोते थे पर वास्तव में रात में कमरे की दशा बदल जाती। सत्तो नीचे जमीन पर बिस्तर लगा लेती। जरूरत पर वह फौलाद सिंह का ध्यान रखती पर उससे बोलती कुछ भी नहीं। दोनों बहुत नजदीक होकर बहुत दूर रहते।
अभी तक दूरियां मिटाने के लिये किसी ने भी प्रयास नहीं किया था। पर आज फौलाद सिंह पहल करना चाह रहा था। यह दूरियां बनी भी तो उसी की बजह से थीं।
रात में सत्तो कमरे में आयी। कमरा बंद कर अपना बिस्तर लगाने लगी। फौलाद उसे रोकना चाह रहा था पर रोक नहीं पाया। अभी मन से शर्म नहीं हटी थी।
सत्तो लेट गयी और जल्द नींद के आगोश में चली गयी। पर फौलाद सिंह की आंखों से आज नींद कोसों दूर थी। बहुत देर सोचते सोचते मन वैचैन हो गया। धीरे धीरे आंखों से आंसू बहने लगे। पर वह मजबूत बनकर उन्हें पोंछने लगा। पर हिचकियों से गला भर गया। आवाज सुनकर सत्तो जग गयी। ग्लास में पानी भरकर उसने फौलाद सिंह की तरफ बढाया।
फौलाद सिंह अविचल रहा। सत्तो उससे बोलना तो नहीं चाहती थी पर ऐसी स्थिति में उसे बोलना पड़ा।
" पानी पी लीजिये, छोटे ठाकुर साहब। हिचकी बंद हो जायेंगी।"
वैसे सत्तो ने फौलाद के अश्रु पूर्ण नैंत्र भी देखे। एक बार को वह भी विचलित हो गयी। उसका मन हुआ कि अपने पति को चुप कराये। उसके दुख का कारण पूछे। पर फिर खुद को रोक लिया। दूसरों के दर्द मिटाती आयी स्त्री अपने पति के दर्द को नजरअंदाज कर रही थी।
" तुम्हें मेरी हिचकियाँ ही नजर आ रही हैं। यह आंसू नजर नहीं आये।"
सत्तो शांत रही। चुपचाप पानी का गिलास हाथ में रखे फौलाद सिंह का इंतजार करती रही। उसका मन उसे धिक्कार रहा था। प्रेम का पौध कुछ ज्यादा बड़ा हो चुका था। सत्तो अब उससे नजर छिपा नहीं सकती थी।
" सत्तो। मैं अपनी भूल मानता हूं। अब मुझे माफ करो। क्यों न हम पुरानी बातों को भूलकर नयी शुरुआत करें। अपने प्रेम का अध्याय लिखें।"
सत्तो के लिये अभी बहस करने से ज्यादा बढकर फौलाद सिंह को पानी पिलाना था।
" ठाकुर साहब। मैं आपकी सब बातें सुनूंगी। फिर अपनी बात भी कहूगी। पर अभी पानी पी लीजिये। शांत हो जाइये। "
पानी पीकर फौलाद सिंह सत्तो के वाक्य का इंतजार करने लगा।
" जी। अब बताइये ठाकुर साहब।"
" सत्तो। मुझे लगता है कि मेने तुझपर बड़ा अन्याय किया है।"
" ऐसा क्यों। मेरे साथ तो ईश्वर ने ही अन्याय किया है। आपने तो नहीं। एक पिता की चहेती बेटी ने कितनी तकलीफें सहन की हैं। अब तो आदत हो चुकी है। किसी को दोष नहीं देती।"
" तो मैं मान लूं कि तुमने मुझे माफ कर दिया। हमारे शुष्क जीवन में प्रेम का सावन बरसात करेगा।"
" जरा रुकिये ठाकुर साहब। मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। फिर भी थोड़ा समय चाहती हूं। आपपर पूर्ण विश्वास करने के लिये मुझे थोड़ा समय चाहिये। आपके विचारों की दृढता परखने के लिये कुछ तो समय लगेगा। प्रेम बहुत बड़ी बात है। हम और आप प्रेम पथ पर अविचल चल सकते हैं, यह परखने में समय तो लगेगा। आखिर केवल इसीलिए मुझे समय न दिया जाये, कि मैं एक लड़की हूं, शायद सही तो नहीं है। आपने भी तो मुझे पवित्र मानने में समय लिया है। "
फौलाद सिंह सत्तो के तर्कों से परास्त हो गया।
" सत्तो। मैं तुम्हारी बातो से सहमत हूं। भले ही आप मुझपर विश्वास करने में समय लो पर क्या हम आज दोस्ती का रिश्ता तो बना सकते हैं। "
सत्तो को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। आज वह फौलाद सिंह को दोस्त मानकर उसी के बिस्तर पर सोने जा रही है। आज उसे इतना तो विश्वास करना होगा कि बिना उसकी इच्छा के फौलाद सिंह उसे छूएगा भी नहीं। अब फौलाद सिंह का इम्तिहान है। उसे दोस्ती की परीक्षा में खरा उतरना है। सत्तो के साथ प्रेम के रथ पर सवारी करने से पूर्व की सत्तो की दोस्ती की शर्त को उसे पूरा करना है। वैसे एक ही बिस्तर पर सो रहे पुरुष और नारी दोनों का ही मन कभी भी विचलित हो सकता है। पर फौलाद सिंह के अनुसार सत्तो असाधारण स्त्री है। दोस्ती की परीक्षा में केवल और केवल फौलाद सिंह को ही खरा उतरना है। उसे ऐसा करना होगा ताकि वह अपना प्रेम हमेशा के लिये पा सके।
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हवेली में आज बहुत चहल पहल थी। लगभग सारे रिश्तेदार आ चुके थे। अनेकों हलवाई काम पर लगे थे। टैंट बाले, बिजली बाले, फूल बाले किसी को भी फुर्सत नहीं थी। वैसे बच्चों के जन्म पर ही हिजड़े अपना नेग मांग चुके थे। पर आज फिर से वह हवेली पर आ पहुंचे। ठाकुर भानुसिंह ने उन्हें भी निराश नहीं किया।हवेली में ढोलकें बज रही थीं।
अचानक पुलिस की अनेकों गाड़ियां आ पहुंची। इंस्पेक्टर राधा के पास आई जी साहब का पत्र था। जिसके अनुसार उनके मामले की जांच के लिये स्थानीय पुलिस को उनकी मदद करनी होगी।
" बंद करो सब। पकड़ो सभी को। कोई भी बचकर नहीं निकलना चाहिये। आदमी हो या औरत, पहले सभी को गिरफ्तार करो। अभी किसी की कोई बात नहीं सुननी है।"
सैकड़ों की संख्या में पुरुष पुलिस और महिला पुलिस आदमियों और औरतों को पकड़कर गाड़ियों में बैठाने लगे। अड़ोसी, पड़ोसी, रिश्तेदार किसी का बहाना नहीं चला।
" आखिर क्या बात है मैडम जी। आप मुझे नहीं जानती है। मेरे खास रिश्तेदार विधायक है। "
दामिनी के पिता ने बात बढायी।
" ऎसा है विधायक जी के रिश्तेदार जी। अभी तो चलना होगा। पता करना है कि इनमें से कौन कौन अपराधी है। जो निरपराध होंगे, वे सब छूट जायेंगे।"
" पर मैडम जी। हम यहाँ के ठाकुर, हमारा अपराध से कोई वास्ता नहीं है। "
इस बार बात ठाकुर भानुसिंह ने बढायी।
" अगर वास्ता न होता तो हम इतनी दूर से न आते। लड़की खरीदना कोई कानूनन काम नहीं है ठाकुर साहब। "
अब ठाकुर साहब समझ गये। वास्तव में उन्होंने पाप तो किया ही था। चुपचाप गाड़ी में बैठ गये। अब अपना जीवन उन्हें अंधेरे में नजर आ रहा था। अधर्म का दंड तो उन्हें भुगतना ही होगा। पर इस पाप के दोषी केवल वही थे।परिवार के अन्य लोग नहीं। गेंहू के साथ घुन भी पिस जाते हैं।
जहाँ बड़ी चहल पहल थी, वहाँ बिलकुल शांति थी। बड़ी बड़ी गाड़ियों में बंद कर सारे पुलिस और स्त्री थाने पहुंचाये जा रहे थे। हलवाई अपना काम बंद कर अपनी अपनी राह चल दिये। इंस्पेक्टर राधा समझ नहीं पा रही थी कि अपहृत लड़की कौन है। कोई भी जबरदस्ती से रहती नहीं दिख रही। कहीं अपराध लड़की खरीदने से भी ज्यादा आगे तो नहीं बढ गया। पता नहीं वह लड़की सत्यवती इनमें है या नहीं। कहीं इन्होंने उसे ठिकाने तो नहीं लगा दिया। संभव है कि वह इनसे डरकर शांत बैठी है। थाने में रामदीन अपनी बेटी को पहचान ही लेगा। फिर उसे हिम्मत दूंगी। इन अपराधियों को जेल के भीतर तक पहुंचाने में सत्यवती का वयान मुख्य होगा।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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