गरीब  नहीं  होता  वह कभी,
जिसके  पास धन नहीं कोई।
जो  अकूत  धन  होने पर भी,
तृप्त नहीं कभी ,दरिद्र है वही।।

संतोष नहीं अरु तृप्ति है नहीं ,
तन में  तन्दुरुस्ती भी न होती।
धन- पिपासा  भी नहीं मिटती,
पेट  में  अन्न  भी  नहीं  पचती।।

सुख को भोगने की शक्ति नहीं,
दान  करने  हाथ  बढ़ते   नहीं ।
चिंता  से  आंखों  में  नींद नहीं,
मन  में  जिसके  शांति है  नहीं।।

वह  गरीब जिसका इस जग में,
धन के सिवा कुछ  भी न होता।
स्वास्थ्य नहीं तृप्ति,शांति नहीं है,
दान  न कर  धन को   जो रोता।।

धन  नहीं  पर  वह  गरीब नहीं ,
दीन  भले  वह , पर  हीन नहीं।
है  तृप्ति,  शांति, परोपकार भी,
सरल  मन में प्रभु का वास भी।।

मांगे  वह प्रभु से इतना ही,
जितने  में वह भूखा न रहे।
साधु  भी  भूखा जाये नहीं,
दीनबन्धु से अरज दीन करे।।
--पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)