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भावनाएं तुम्हारी अनंत प्रिय
गति कलम की मैं अमित लिखूं
बन जाओ जीवन मेरा प्रिय
तुम्हारे लिए मैं प्रीत लिखूं
भेद हृदय के सारे बताओ तुमसे भी मैं ना + राज़ रखूं
मुझको कभी न तुम मनाओ
न मैं कभी तुम्हें नाराज़ रखूं
बन जाओ खुली किताब प्रिय
अपनी भी मैं अतीत लिखूं बन जाओ जीवन...
तपती दोपहर में मेरे लिए
बरस जाना तुम बन के जल तुम्हारे लिए जाड़ों में मैं
शिखी बन जाऊंगी जल
बन जाओ सांवल मेघ प्रिय
सावन सा मैं संगीत लिखूं
बन जाओ जीवन...
जीवन समृद्धि तुम्हारी बनूं मैं तुमसे ही अन्न -औ - अर्थ रहे
एक दूजे को परिभाषित करें हम
व्यर्थ का ना कोई अनर्थ रहे
बन जाओ पर्वत अटल प्रिय
झरने सी झरती मैं रीत लिखूं
बन जाओ जीवन...
सौंदर्य तुम्हारा बनारस सा
मैं बहती गंगा सी कलकल
मेरे दुख सारे हर ले आज
तेरे हर लूंगी मैं कल - कल
बन जाओ विजय पताका प्रिय
समीर सदृश मैं जीत लिखूं
बन जाओ जीवन मेरा प्रिय तुम्हारे लिए में प्रीत लिखूं
भावनाएं तुम्हारी अनंत प्रिय
गति कलम की मैं अमित लिखू।
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स्वरचित व मौलिक-- कीर्ति रश्मि 'नन्द'( वाराणसी)

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