कोमल सी अपराजिता 
ऊपर चढ़ती ही जाती है, 
बस थोड़े से अवलम्ब से, 
बढ़ती ही जाती है। 
बार -बार हटाने पर भी, 
खिल उठती है, 
जिस मिट्टी में एक बार लगाया, 
उसमें सदैव जीवंत रहती है !
जाने कौन सी होड़ है आसमां से, 
उसकी ओर बरबस खींची चली जाती है। 
नन्हीं खुशियों की तरह 
नीले फूलों को अपने दामन में समेटे, 
अपने शीर्षबिंदु से मिलने अग्रसर रहती है। 
कोमल सी अपराजिता कितना सहती है!
धूप, तेज़ बारिश, कोहरे की थपन !
पर कभी थकती नहीं, 
बस अपने शीर्षबिंदु की ओर 
अग्रसर रहती है। 
जाने कौन सी होड़ है आसमां से, 
उसकी ओर खींची चली जाती है। 
कोमल सी अपराजिता कितना सहती है, 
पर पीछे नहीं हटती, 
आगे बढ़ती ही जाती है, 
अपना अस्तित्व कायम रखती है।  
बस थोड़े से अवलम्ब सा, 
अवलंब चाहती है....... 
कोमल सी अपराजिता... 
© डॉ पल्लवी कुमारी कुमारी"पाम