वह कुछ रहा है तुम्हें,
काली स्याह रात भी रोशन हो सकती है,
यह बता रहा है तुम्हें!
कितने भी गहन हो अंधेरे,
मिट सकते हैं, बस डर कर रुकना नहीं है
मंज़िल चाहे दूर हो, थमना नहीं है,
लाख देखेंगे लोग दाग तेरे दामन में
यह तुम निर्भर है-
तुम्हें कैसे अपनी चमक बनाए रखना है।
ज्यों जलते हैं अलाव
जाड़े की सर्द रातों में
हवाओं से उलझते हुए भी,
मर्यादा में रहते हैं
सोख लेते हैं जलन और
खुद तप कर भी सबको राहत देते है!
करने को उजाला अपने घर में,
अपनों की खातिर
तुम्हें खुद ही जलाए रखना है।
देखो यह चांद कुछ समझा रहा है तुम्हें
चांद का इशारा समझो तो
यह जो घटती-बढ़ती रहती हैं
कभी खो भी जाती हैं
अंधेरों को चीर कर यह किरणें
फिर पूरा यौवन ले खिल आती हैं
बन कर दरिया प्रेम का
पिघलती जाती हैं,
आशा की किरण बन
धरती पर उतरना है
चांद करता है कुछ इशारा
चांद का इशारा समझो तो!..
शालिनी अग्रवाल
जालंधर

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