कल जिसे मैं नागवार थी,
आज मुझे खोने से डरता है ....
अजीब मिजाज पाया है हुजूर ने,
दिल रूबरू होने से डरता है .....

जिसने चुभोए दिल में 
लफ्जों के नश्तर कई,
जाने क्यूं वो आज-कल ,
मेरे रोने से डरता है ......

अजीब मिजाज पाया है हुजूर ने,
दिल रूबरू होने से डरता है .......

बदलती है फितरत उसकी,
हर लम्हे कुछ इस तरह......
कभी होता दिले शहंशाह मेरा,
कभी नजरों से उतरता है.......

अजीब मिजाज पाया है हुजूर ने,
दिल रूबरू होने से डरता है......

कैसे कहूं कहना है क्या,
वो कभी साथी नहीं बनता मेरा.....
मैं टिमटिमाती चिराग हूं,
वो तूफानी हवा बनकर गुजरता है ......

अजीब मिजाज पाया है हुजूर ने,
दिल रूबरू होने से डरता है .......
......✍️ पिंकी मिश्रा