मै मुकेश लखनवी माननीय फ़्लाइंग सिख पद्मश्री अलंकृत श्री मिल्खा सिंह जी को मेरी ये रचना समर्पित करता हूँ और उनको अपनी कलम के द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ 

इतनी तेज दौड़ता था वो जैसे 
पड़ गया हवा से पाला था 
इस हुनर के नाम ताउम्र उसने कर डाला था 

बचपन उसका बहुत ही दुस्वारियों मे बीता था 
मगर वो उन पलों को हँसते हुए जीता था 
फिर एक दिन ऐसा हुआ जिसकी कोई कल्पना न थी 
भागना पड़ा देश छोड़कर जिसकी कोई तमन्ना न थी 
अलगाव के दर्द मे उसके झिलमिल सितारे गए 
कुछ लोग ही अपने बचे बाकी सब मारे गए  
कुछ ऐसा था उसका बचपन 
अपने गांव का हिम्मतवाला था 
इतनी तेज दौड़ता था वो जैसे 
पड़ गया हवा से पाला था

इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों मे वो अपना नाम अमर कर गया 
जिसके चीते की फुर्ती देखकर पाकिस्तान भी डर गया  
ऐसी चौकड़ी भरता था वो 
ऐसा अजब निराला था 
इतनी तेज दौड़ता था वो जैसे 
पड़ गया हवा से पाला था

उसकी प्रतिभा देखकर विदेशी भी नतमस्तक हुए 
उसके नाम देश विदेश के कई सारे पदक हुए 
"फ़्लाइंग सिख" था वो 
कुछ इस तरह खुद को ढाला था 
इतनी तेज दौड़ता था वो जैसे 
पड़ गया हवा से पाला था

आज देश के युवाओं के दिल मे 
ऐसा घर वो कर गया 
उसकी सादगी देखकर "लखनवी" मेरा भी गला भर गया  
कभी जरुरत से ज्यादा कुछ न लिया 
ऐसा वो दिलवाला था 
इतनी तेज दौड़ता था वो जैसे 
पड़ गया हवा से पाला था

"मिल्खा"जैसा न कोई था "लखनवी" 
और न कोई और होगा 
वो दौर कुछ और था 
आगे कुछ और दौर होगा 
देश की आन बान शान मे 
वो कहीं न झुकने वाला था 
इतनी तेज दौड़ता था वो जैसे 
पड़ गया हवा से पाला था

आपका मुकेश "लखनवी"