जब थामी है बागडोर रिश्तो की,
टूटने बिछडने का सिलसिला !,
थमा ही नहीं!!
कई, पत्ते मिले है, जो बेमेल से है!
चाहते दम तोड़ती है,
कुछ मिला ही नहीं!!
आजमातें है अपने, अपनो को,
दुश्मन ढूंढने की, अब कोई वजह,
ही नही!!
जो चुभते नुकीले , कीलो की तरह,
अब, खजरों को बदनाम करने की,
कोई वजह ही नहीं!!
कितने बुतपरस्त से हो गये रिश्ते,
सामने नजर चुराने की कोई,
वजह तो नही!
फिर भी हम खुश है, इन्ही रिश्तो में,
कोई और जीने की वजह तो नही!
दर्द बेबुनियाद से है, तोहमतें भी ,
संगदिल है,
कैसे तोड़े कुछ रिश्ते, कोई वजह,
तो नही,!!
श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर लेखिका रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत

1 टिप्पणियाँ