हर रात एक खत मैं, तुम्हारे नाम लिखती हूं.....
कैसे गुजारे दिन सुबह से शाम लिखती हूं.......
हर रात...........
कभी लिखती तुम्हें रांझा खुद को हीर कहती हूं,
कभी बन जाती हूं राधा तुम्हें घनश्याम लिखती हूं..
हर रात..............
हमारी मिलन की जो अधूरी सी कहानी है,
ख्वाब में उसका अलग अंजाम लिखती हूं........
हर रात..............
मुझमें मैं नहीं शामिल, बस तू ही तू धड़कता है,
मैं अपने पते में खुद को ही अनजान लिखती हूं....
हर रात...........
तेरे एहसास के बिन, कभी धड़का जो मेरा दिल,
मैं दिल की बस्ती को बहुत विरान लिखती हूं.......
हर रात............
बड़े नादान है जो कहते,बिछड़कर भूल जाते सब ,
मैं तो विरह को प्रीत की पहचान लिखती हूं.......
हर रात...............
.....✍️ पिंकी मिश्रा

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