राधा और मयूरी आज दोनों चुप थे। आज दोनों की इच्छा काम पर जाने की न थी। पर पुलिस की नौकरी में यह  संभव न था। वैसे यह हर साल की परेशानी थी। साल में एक दिन ऐसा जरूर आता था जब राधा अपने बेटे की याद में और मयूरी अपने पति की याद में कुछ देर आंसू बहातीं थी ।वैसे तो राधा के पति भी शहीद हुए थे। पर वह ज्यादा पुरानी बात है। समय ने घाव पर मलहम लगा दिया। पर बेटे के जाने का दुख और बेटी सम बहू का दुख मन को ज्यादा कचोटने लगता।

   राधा ने मयूरी के कंधे पर हाथ रखा। मयूरी पलटकर राधा से चिपट गयी। कार्यक्षेत्र पर फौलाद समझी जाती दो स्त्रियां अपनी भावनाओं को रोक पाने में असमर्थ थीं। 

  " ना बेटा ना। इतना नहीं रोते।" 

   वैसे राधा खुद रोते जा रही थीं फिर भी मयूरी को चुप करा रही थी। 

  " आप भी मम्मा। जरा रोने भी नहीं देतीं। साल में बस एक दिन तो रो लेने दिया करो। प्रेम दीपक में अश्रु घी डाल लेने दिया करो। मम्मा। मैं रो कहाॅ रही हूं। हवन कर रही हूं। ऐसा ही होता है एक शहीद की पत्नी का हवन।" 

  राधा ने मयूरी को अपने सीने से चिपका लिया। जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माॅ के सीने से लगकर सब दुख भूल जाता है, मयूरी भी भूल गयी। फिर दोनों ने एक दूसरे के आंसू पोछे और सब सामान्य हो गया। 

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   आंसुओं के घृत से हवन के बाद प्राप्त शक्तियों से आज मयूरी अलग ही लग रही थी। आज उसने ऐसी अनेकों शिकायतें निकाल लीं जो वास्तव में शिकायत से ऊपर की बात थीं। जिन शिकायतों पर पूर्ववर्ती अधिकारियों को आपराधिक मुकदमा दर्ज करना चाहिये था, ऐसी अनेकों शिकायतें मामूली शिकायत की फाइल में पड़ी थीं। मयूरी उनमें से एक एक को देख रही थी। मुंशी को मुकदमा दर्ज करने को बोलती। हालांकि यह खुद उसी के लिये परेशानी की बात होती। मुकदमा दर्ज करने के बाद उसकी जांच कर एफ आर उसी को लगानी थी। आपराधिक मुकदमों के अपराधियों को पकड़ना था। इन झंझटों से बचने के लिये और थाने का रिकोर्ड बेहतर रखने का तरीका यही है कि ज्यादातर शिकायतों को यों ही पड़ा रहने दिया जाये। 

  अचानक एक शिकायत को पढकर मयूरी तुरंत उठ खड़ी हुई। एक हवलदार को लेकर निर्दिष्ट पते पर चल दी। इंस्पेक्टर राधा समझ गयी कि कोई बड़ी बात है। उसे मयूरी की क्षमता पर पूरा यकीन था। 

  रामदीन और सावित्री कितनी ही बार थाने गये। कभी उनसे किसी ने ठीक से बात भी नहीं की। आज थाने की दरोगा खुद उनका दरबाजा खटखटा रही थी। यह बड़े आश्चर्य की बात थी। 

  विभिन्न जानकारी लेकर मयूरी ने रामदीन और सावित्री को होसला दिया। वचन दिया कि वह सत्यवती को खुद तलाश कर लायेगी। रामदीन को लगा कि आज सचमुच माता दुर्गा उसके घर आयीं हैं। 

    शाम तक मयूरी ने इस मामले में पर्याप्त जानकारी इकट्ठी कर ली थी। सत्यवती एक होनहार नर्स थी। जो सुबह सुबह अस्पताल से वापस घर जाते समय गायब हो गयी। मुखबिरों से यह भी पता चला कि इस इलाके में अन्य लडकियां भी गायब हैं। 

   अब राधा को चिंता होने लगी। कहीं मयूरी बिना बताये दबिश देने तो नहीं चली गयी।इस लड़की में बस यही कमी है। पूरी बात नहीं बताती। 

   " गुड आफ्टरनून मैडम।" 

  इस आवाज को सुनकर राधा का मन हुआ कि अभी उठकर मयूरी को गले लगा ले। पर नौकरी के समय वह जज्बातों को दूर रखती थीं। 

  " कहाॅ से आ रही हैं दरोगा साहिबा। सुबह से कहाॅ गायब थीं।" 
  " मैडम। बड़ी गडबड़ है।" 

  फिर मयूरी ने राधा को बताना शुरू किया। राधा भी चौक गयी। थोड़ी ही देर में सारे मुखबिर थाने में हाजिर थे। 

  " देखो। आप सब कोई मुफ्त में काम नहीं करते हों। इसके लिये हम तुम्हें मुंहमांगे पैसे देते हैं। मुझे और कुछ नहीं चाहिये। जो जो लड़कियां गायब हैं, उनकी पूरी रिपोर्ट मेरे पास होनी चाहिये। शहर में कुछ भी अलग लगे तो मुझे खबर मिलनी चाहिये। गुम लड़कियों का राज जल्द खुलना ही चाहिये। "

  फिर मयूरी तक मुड़कर बोली। 

" मयूरी। इस मामले की तहकीकात तुम अपने तरीके से करोंगी। मुझसे जो जरूरत हो, तुरंत बोलना। पर कुछ बड़ा करने से पहले मुझे बता जरूर देना। "

" यस मैडम। "
  मयूरी ने इंस्पेक्टर साहिबा को सलाम किया और निकल गयी। राधा जानती थी कि अब मयूरी जल्द घर नहीं आयेगी। वास्तव में यह उन दोनों की ही कमजोरी थी। अपराध की खबर मिलते ही जब तक अपराधी को पकड़ न लें, वे चैन से नही बैठती थीं। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'