पहले घरों में  छोटा या बड़ा आंगन  होता था।किनारे की मिट्टी में लगा छोटा सा पेङ---उस पर बैठी अनेको चिङिया हमारे मन के नैराश्य  को दूर करतीं---आंगन  में फुदकती ---दाना चुगती----मन का अकेलापन  भी दूर करती थीं। 
अनचाहे कीङो को खाती ---आंगन को स्वच्छ भी रखतीं ।आंगन कई  मायनों में हमारे जीवन को प्रभावित करती थीं---
आज के घरों में  इनका न होना पारिस्थितिकी  के साथ मनोवृति को भी रूग्ण कर रही हैं। ऐसा मैं समझती हूं। आंगन एक ऐसी जगह होती थी जहां छोटी-छोटी चिङिया काफी सहज होती थी।



ओ री गौरैया--

ओ री गौरैया,,
प्यारी सी चिङिया,,
पंख पसार---
 खेलो न  मेरे द्वार!!

सूना है आंगन,,
छत के मुंडेर,,
बाबा की खिङकी---
रूठा दालान!!!

ढूंढे है तुमको---
आंगन के अमरूद 
का नीचा मचान,,,
पेङो की झुरमुट --
छप्पर का झुकता 
 खपङे का ढलान!!

ओ री गौरैया,,
प्यारी सी चिङिया
ची-ची करते
सुनाओ  न फिर से
मिठी सी  गान!!

ओ री गौरैया--
 मेरे आंगन की शान!!
खेलो न फिर से
मेरे आंगन  के द्वार!!
                 ✍ डाॅ पल्लवी कुमारी "पाम"