"जिनके घर शीशे के होते हैं उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते श्वेता!" अपनी पत्नी के कमरे में आते ही आशीष बोला।

" मतलब?" श्वेता ने हैरानी से पूछा।

" तुम खुद दो बेटियों की मां हो कैसे दूसरों की बेटियों पर उंगली उठा सकती हो।" आशीष फिर बोला।

श्वेता समझ गई अभी बैठक में वो अपनी पड़ोसन मिसेज शर्मा के साथ अपनी और पड़ोसनों मिसेज गुप्ता और मिसेज वर्मा की बेटियों की बुराइयां कर रही थी उनके चरित्र पर उंगली उठा रही थी वहीं आशीष ने सुन लिया है।

"मेरी बेटियों और उन लड़कियों में फर्क है बहुत तुम उनसे तुलना कर रहे मेरी बेटियों की वैसे भी मेरी बेटियां अभी बहुत छोटी हैं!" श्वेता तुनक कर बोली।

" बात तुलना की नहीं है श्वेता बात है सही गलत की तुम जानती हो मिसेज वर्मा की बेटी लड़कों के साथ क्यों घूमती? तुम्हे पता है मिसेज गुप्ता की बेटी कल जिसके साथ वापिस आई वो कौन था?" आशीष ने पूछा।

" मुझे क्या करना जानकर होगा उसका बॉय फ्रेड ऐसी लड़कियां कई कई बॉयफ्रेंड रखती!" श्वेता मुंह बना कर बोली।

" वाह जो लड़कियां बाहर नौकरी करें वो तुम्हारी नज़र में ऐसी वैसी हो गई । फिर तो अपनी खुशी और परी को स्कूल से नाम कटवा घर में बैठा लेते हैं!" आशीष व्यंग्य से बोला।

" अरे दिमाग खराब है तुम्हारा अनपढ़ रखना है बेटियों को कल को अपने पैरों पर खड़ी होंगी तो हमे चिंता नहीं होगी!" श्वेता एकदम से बोली।

" पर कल को वो अपने पैरों पर खड़ी होंगी तो बाहर भी जाएंगी लड़कों से मिलेंगी भी और हो सकता कोई लड़का उन्हें छोड़ने भी आए मैं नहीं चाहता तुम्हारी तरह कोई मेरी बेटियों पर भी उंगली उठाए इससे अच्छा वो अनपढ़ रहें!" आशीष बोला।

श्वेता को झटका सा लगा सही तो कह रहे हैं आशीष मैं ऐसी कैसे हो गई खुद की दो बेटियां है कल को वो भी बाहर जाएंगी उनके लिए कोई बात बनाएगा तो क्या मुझसे बर्दाश्त होगा।

" मुझे माफ़ कर दो आशीष सच में मैं बहुत गलत थी जो बिन जाने किसी की बेटी पर उंगली उठा रही ये भूल गई बेटियां तो मां बाप का गुरूर होती हैं!" श्वेता सिर झुका कर बोली।

" बिल्कुल सही श्वेता वैसे भी जो बात हम अपनी बेटियों के लिए नहीं सहन कर सकते दूसरे की बेटियों को बोलने का हक नहीं हमे....चलो अब बढ़िया सी चाय पिला दो फिर बाहर घूमने चलते हैं!" आशीष ने कहा।

दोनों ने साथ चाय पी और अपनी दस और तेरह साल की बेटियों खुशी और परी के साथ घूमने चल दिए। वापसी आते में देर हो गई गाड़ी से उतरते में उन्होंने देखा मिसेज गुप्ता की बेटी अनुषा बाइक पर एक लड़के के साथ आई है।

" हैलो दीदी!" गाड़ी से निकल परी अनुषा से बोली।

" हेल्लो परी नमस्ते अंकल आंटी ये मेरे ऑफिस में काम करते हैं सौरभ नाम है इनका मैं जिस रास्ते से आती वो सुनसान है तो ये मुझे घर छोड़ देते हैं !" श्वेता को उस लड़के की तरफ देखते देख अनुषा ने खुद लड़के का परिचय दिया।

" बहुत अच्छी बात है बेटा वैसे भी जमाना बहुत खराब है और सुनसान रास्ते पर ना जाने कैसे लोग मिल जाएं!" श्वेता ने कहा।

" जी बिल्कुल और अनुषा तो मेरी बहन जैसी है अपनी बहनों की रक्षा करना तो हर भाई का फर्ज होता!" सौरभ ने कहा।

" बहुत अच्छी सोच है तुम्हारी धन्य है वो मां बाप जिन्होंने तुम्हे ऐसे संस्कार दिए अनुषा कभी आओ हमारे घर भी मेरी खुशी परी को भी तुमसे प्रेरणा मिलेगी आगे बढ़ने की !" श्वेता ने कहा।

" जी आंटी जरूर !"अनुषा बोली और सबने एक दूसरे से विदा ली।

आशीष श्वेता को प्यार से देख रहा था देर से ही सही कम से कम उसकी पत्नी ने दूसरे की बेटी को भी अपने जैसा तो माना वहीं श्वेता की आंखों में शर्मिंदगी थी बेवजह अनुषा के लिए इतनी बातें जो बनाई थी।

दोस्तों ऐसा अक्सर होता मोहल्ले में किसी की जवान बेटी को किसी लड़के के साथ देख अक्सर कुछ औरतें बाते बनाती जबकि आज के समय में ये आम बात है जब लड़की घर से बाहर जाती तो सबसे मिलना जुलना होता ही है बिना किसी को जाने उंगली उठाने वाले लोग भूल जाते की उनके खुद के घर में भी बेटी है।

संगीता अग्रवाल