देव देर रात मे प्रिति का आनलाईन आने का इंँतजार करने लगता है।
प्रिति साढ़े 11 बजे ऑनलाइन आती है फिर थोड़ी देर बात करके बोलती कल बात करेंगे और कहकर आँफलाईन हो जाती है।
दूसरे दिन प्रिति स्कूल जाती है। आँफिस मे जाकर देव से मिलती है उससे कुछ बोलती नहीं है चुपचाप अपना काम करने लग जाती है।
देव प्रिति से पूछता क्या बात है "आज आप इतनी शांँत कैसे है कुछ हुआ है क्या?? "
प्रिति "नही तो"
देव "आकर आप हम से कुछ बतलाए भी नहीं
कम से कम "शुप्रभात' तो बोल देती"
प्रिति."ओह' शुप्रभात देव"
देव "आप इतनी बुझी बुझी सी कयूँ है"
दोनो अपना काम करते हुए बात कर रहे होते है।
प्रिति "कुछ नही आज फिर चक्कर आ रहे है.इसलिए थोड़ी बुझी सी दिख रही हूँ"
देव "मिस बी पी लो' ..कब से आ रहे है ये चक्कर आपको"
प्रिति "यही एक दो दिन से"
देव "शायद आप कुछ ज्यादा ही सोचती है इसलिए"
प्रिति "ऐसा कुछ नही"
देव "तो.फिर कैसा है बताईए न"
प्रिति कुछ नही बोलती है अपनी फाईलस उठा कर क्लास की ओर चली जाती है।
बेचारा देव बैठे बैठे सोचने लगता है,आखिर बात क्या है।अब देव के मन में जानने की उत्सुकता और प्रबल हो जाती है वह मासूम से चेहरे पर उदासी का कारण जानने के लिए व्याकुल हो जाता है ,पर करे क्या प्रीति बताती ही नहीं।
वक्त के रफ्तार के साथ प्रिति अपने कार्य क्षेत्र में परांगत हो जाती है। सभी शिक्षक बच्चे उन्हें आदर सम्मान देने लगे। प्रीति भी स्कूल में बहुत खुश रहने लगी । इतनी जल्दी तरक्की करने के लिए सभी शिक्षक उसकी बहुत प्रशंसा करते है , और वह अपनी कामयाबी का श्रेय हमेशा देव शालिनी को दिया करती ।
कल से जाड़े की छुट्टी होने वाली है आज टीचर्स सभी बिजी भी थे ,क्योंकि सभी बच्चों को गृहकार्य जो देने थे।
प्रिति स्टाफ रुम मे जाती ..शालिनी से मिलती है और पूछती है तुमने नोट डाऊन कर लिया का बच्चों को होमवर्क देने का ..
शालिनी नही यार थोड़े से बाकी है। ले तू लिख डायरी मे ,मै बताती जाती हूँ
प्रिति एक चैयर लेकर शालिनी के पास बैठ जाती है।
और शालिनी बताती गई प्रिति लिखती गई।
बेल रींग हो जाती है ,दोनो अपनी अपनी क्लासेज मे चली जाती है।सभी शिक्षक अपने अपने क्लासेज मे बच्चों को गृहकार्य करने को देते है । सख्त हिदायत देते है , छुट्टियों मे मजे करने के साथ साथ पढाई भी करना।
सभी बच्चे भी आज बहुत उत्साहित थे। वो भी उत्साह के साथ जी मैम कहते है।
आज शालिनी, प्रिति और देव तीनो ही बहुत दुखी थे क्योंकि वे लोग अब मिल नहीं पाएंँगे।
ना मिलने के दुख से तीनो ही खामोश थे।
शालिनी प्रिति से कहती है तुम दोनो मुझसे मिलने मेरे घर आओगे न ,तुम दोनो तो छुट्टी के बाद मिल लोगे। लेकिन मेरी तो डिलीवरी की टाईम नजदीक है मै तो अब सीधे छः महीने बाद मिल पाऊंँगी, तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगी न.. कहकर हमेशा हँसने और बोलने वाली शालू रो पड़ती है।
प्रिति डाँटते हुए शालू से कहती है "चुपचुप एकदम चुप ये क्या बचपना है तुम तो ऐसे रो रही हो जैसे मै मरने वाली हूँ।
मेरा भांजा या भांजी सोच रहे होंगे ..कैसी मौसी है मेरी जो मेरी मम्मी को रुला रही है।"
शालिनी प्रिति के होठो पर हाथ रखते हुए कहती है
ये क्या अपशब्द बोल रही हो .".मरे मेरे दुश्मन ..तुम तो मेरी सबसे प्यारी सहेली हो। आगे से ऐसे नहीं कहना"
प्रिति "तुम भी आगे से ऐसा रोना धोना मत मचाना"
देव "हो गया आप दोनो का मेलोड्रामा।"
उदासी का माहौल थोड़ा हल्का हो जाता है। फिर तीनो हँसने लग जाते है।
इस तरह तीनो अपने अपने घर के लिए निकल जाते है। शालू अपने हसबेंड के संग जाने से पहले प्रिति को गले लगाती है और कहती है अपना ख्याल रखना..बहुत याद आओगी तुम।
प्रिति शालिनी से बहुत उदास स्वर मे कहती है हम्म ...तुम भी ध्यान रखना अपना।
प्रिति और देव एकसाथ घर जाने के लिए निकल जाते है। लेकिन दोनो मे से कोई भी बात नहीं करता है।
प्रिति अपने घर पहुंचने वाली थी उससे पहले देव को पैसे देती है।
देव "किसलिए दे रही है पैसे"
प्रिति "कल आपने दिया था न ,कल तो मेरे पास पैसे नहीं थे।आज सैलरी मिली है इसलिए आपको दे रही हूँ।"
देव एकदम से गुस्सा होकर बोलता है। "आप खुद को समझती क्या है...बहुत पैसे वाली हो गई न आप..
पैसे ही देने है न आपको दिजिये मुझे, रिचार्ज के ही क्यों, फिर मुझे उसके भी पैसे दिजिये ,जो मै आपको
इतने सालो से अपना समय देता आ रहा हूँ ..आपको
पग पग पर सिखाया है उसका भी दिजिये।और..और
कहते कहते चुप हो जाता है।आप मुझे अपना दोस्त नहीं मानती आज आप ने अहसास दिला दिया।
देव.गुस्से से पीठ घुमाकर खड़ा हो जाता है।
प्रिति "नही" "देव नहीं आप मुझे गलत समझ रहे है। मैने आपके आत्मसम्मान को ठेस पहुंँचाने के लिए पैसे नहीं दे रही थी।
" मुझे माफ कर दिजिये प्लीज"..मेरा ऐसा कोई भी इरादा नहीं था। आगे से कभी नहीं , ऐसा कुछ भी कहूंँगी। जिससे आपका मन दुखे।
आप मेरे दोस्त है और हमेशा रहेंगे।
फिर कभी भी ये बात मत कहियेगा। कहकर उसकी आवाज भारी होने लगती है।"
देव घुमकर देखता है प्रिति की आँख आँसुओं से भरी हुई है। "माफी चाहता हूँ आवेश मे आकर आपका दिल दुखाया।"
प्रिति जी दोस्ती के लिए तो लोग जान दे देते है। ये तो सिर्फ पैसे है, एक बात बताईये कल अगर मुझे किसी मदद की जरूरत होगी तो आप क्या करेगी।
प्रिति "आपकी मदद"
देव "क्या मुझे उसके पैसे देने होगे"??
प्रिति "नहीं" ...." आप मुझे शर्मिंदा कर रहे है।"
देव "तब फिर आपने ऐसा कैसे सोचा"
प्रिति "साँरी न..देव..अब से नहीं सोचुँगी"
प्रिति का घर आ जाता है ,मुस्कुराते हुए बाय बोलकर वह अपने घर चली जाती है।
क्रमशः...

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