हे पिता तू सबसे महान है।
तुझसे ही मेरा अस्तित्व और पहिचान है।।

अनजान थी मैं इस झूठी दुनिया से।
रूबरू कराया है तूने मुझे इस सच्चाई से।।

आयी जब मुसीबत मुझ पर तो हर पल साथ निभाया।
कांटों पर चलना सिखाया मुझे हर मुश्किल से बचाया।।

ईस्वर से भी पहले संसार में पिता तेरा दर्जा है।
सौ जन्मों में भी न उतार पाऊँ मैं तेरे त्याग का कर्ज है।।

पिता की महिमा को सारे जग ने गाया है।
श्री राम ने चौदह वर्ष बन में रह कर तेरा त्याग समझाया है।।

परशुराम ने भी किया पिता की आज्ञा का पालन।
पिता की पूजा करने से ही प्रथम पूज्य है गजानन।।

आपकी मौनावस्था में ही छिपा मेरे लिए त्याग और अनुराग है।
आपसे ही मेरी माँ की बिंदी और सुहाग है।।

हर बेटे के भविष्य की आस होता है पिता।
हर बेटी का विश्वास होता है पिता।।

माँ ममता की सरिता होती जो प्रेम की धार बहाती है।
पर पिता शांत है सागर सा जिसमें सारी सृष्टि समाती है।।

हमारी संस्कृति में पिता को ही ईश्वर मानते है।
क्योंकि पिता में ही ब्रह्मा विष्णु और शिव बसते हैं।।

स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी "अक्षरा"