जीवन की नदी! सतत धारा।
कभी पहाड़ रूपी संघर्ष में,
आगे बढ़ती, रास्ता बनाती।।
कभी बहती भावना रूपी,
बाढ़ में। तलाशती सुकून,
के पल। कभी हिलोरें लेती,
ज्वार - भाटे के साथ।।
कभी करती अठखेलियाँ,
साहिल से मिल कर।।
झरनों के साथ गुनगुनाती।
बस सुख- दुःख के साथ।
सतत आगे बढती जीवन,
की नदी।।
श्वेता कर्ण...!!

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