कभी सुबह कभी शाम भारी
कभी है लगता जाम भारी
कभी किसी का नाम भारी
कभी किसी का काम भारी
कभी इंसान की सोच भारी
कभी उम्मीदों का बोझ भारी
कभी सत्ता का प्रभाव भारी
कभी महफिल से लगाव भारी
कभी भार है अपनों से बिछड़ने का
कभी भार उम्मीदों के दरकने का
कभी भार है कुछ करने का
कभी भार है जीने मरने का
कभी भार है प्रकृति के रंग का
कभी भार अंतर्मन मे उठते जंग का
कभी भार जीवन तरंग का
कभी भार ठंडाई मे भंग का
यहाँ जिंदगी के हर कदम मे कितना भार है
इस भार के भार से दबा सारा संसार है
एक भार से निकलोगे तो दूसरा भार आएगा
इस बार बार के भार से कोई न बच पाएगा
इसलिए हर भार को मन से बार बार निकालते रहो
कैसे भी करके अपनी जिंदगी सवांरते रहो
आपका मुकेश "लखनवी"

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