तोड़ कर कफ़स की जंजीरों को उन्मत्त गगन में उड़ने दो
बेटी हूँ तो क्या हुआ मुझको भी अपने सपनों की उड़ान भरने दो।
बेटी हो!!बेटी बन कर रहो!! कब तक इन ढकोसलों को सुनूंगी,
सीने में दबा हुआ दिल कुछ कहना चाहता है उसकी भी तो सुनने दो।
एक ही कोख से जन्मे है बेटा और बेटी एक जैसी ही माँ की पीड़ा हुई,
फिर क्यों फर्क करता है जमाना क्यों बेटा अपना है और बेटी पराई हुई।
सुन कर जमाने के ताने रुकना नही बढ़ते ही जाना है,
अपनी मेहनत और काबलियत से एक दिन अपना लक्ष्य पाना है।
झंकृत होने दो बेटियों के स्वरों को मत छीनों इनके अधिकारों को,
क्योंकि ये बेटियां अच्छी तरह से समझती है अपने संस्कारों को।
मंजिल कितनी भी दूर हो रास्ते कितने भी कठिन हो इन्हें आगे बढ़ने दो,
हर कदम पर दो साथ इनका बेटों के साथ इन्हें भी साक्षरता का पाठ पढ़ने दो।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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