हां मैं रोटी हूं
गोल ,तिकोनी ,मोटी ,पतली
आटा, पानी मिलकर बनी
हां मैं रोटी हूं।
तवे पर जा सिंक जाती हूं
आंच में जा पक जाती हूं ,
घी लगाकर रोनक आती
खाने का स्वाद बढ़ाती हूं
हां मैं रोटी हूं ।
भक्त लोग श्रद्धा से बनाते
ठाकुर जी का भोग लगाते ,
दर्शन ठाकुर जी के कर
स्पर्श ठाकुर जी का पा प्रसाद बन जाती हूं।
मैं खुश हो जाती हूं
संगत सारी हाथ जोड़ती ।
मस्तक से वो मुझे लगाती।
मैं अमृत बन जाती हूं ।
हां मैं रोटी हूं।
भक्त जब मुझे खाते
तब मैं औषधि बन जाती हूं।
हां मैं रोटी हूं,
असाध्य रोग शांत कर जाती।
हां मैं रोटी हूं ।
चिकित्सा तो ठाकुर जी करते ।
सिमरन और श्रद्धा के पानी में ,
समर्पण प्यार से बनाई जाती ।
हां मैं रोटी हूं।
लोगों में ताकत दे जाती।
लहू बन विचर जाती हूं
जीवन संचालक बन जाती हूं
हां मैं रोटी हूं
दिल की कलम से
मधु अरोड़ा

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