लहरों में खेली थी मैं,  फूलों में पली थी मैं
प्रकृति की छाया में प्रकृति सी ही थी मैं
खोई जो पत्थरों के जंगल में..खुद को भी भूल गई हूँ मैं...
निकली थी जीवन तलाशने, खुद ही खो गई हूँ मैं.
एक दिन फिर निकलूंगी- खुद की खोज में जब
उन वादियों में फिर खो जाऊँगी
अभी मिलती सी लगती हूँ सबसे..
इक दिन ऐसा होगा कि मैं हवाओं में मिल जाऊंगी
अभी...बहती जलधारा सी हूँ मैं, विरह की इस तपिश से 
इक दिन वाष्प हो जाऊँगी..
हाँ!! मैं इन हवाओं में घुल जाऊँगी..! 

अभी मैं जलती हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा में रोज़ थोड़ा-थोड़ा 
एक दिन तुम भी तडपोगे- जब मैं आवाज न दे पाऊँगी
उस दिन- तुम भी खो दोगे मुझे-- हाँ- तुम खो ही दोगे मुझे
जब अपने देश मैं लौट जाऊँगी! 
मैं निकलूँगी जब खुद को खोजने,  
तुम भी मेरी तलाश में आओगे- जानती हूँ! 
मै, मगर चाह कर भी साकार न हो पाऊँगी 

चाहा है कभी गर दिल से- महसूस करना दिल से
देखना मन की आँखों से मुझे- 
हर शै में मै ही नज़र आऊंगी
मैं रहूँ या न रहूँ- तेरे आसपास रहूँगी-
मै हवा सी हो जाऊँगी 

उदासियों हावी होने लगें जब मन पर और
निराशाएँ तन-मन शिथिल कर दें, तो-
भर लेना अपने नयनों में गुलमोहर 
कि सिंदूरी सी लालिमा लिए-- मैं आशा बन मुस्कुराऊँगी 

भीड़ भरी दुनिया की वीरानगी में 
कभी तलाशना चाहो कुछ सुकून
तो रोप लेना अपने आंगन में इक अमलतास
पीले से उन फूलों को भर लेना अपने दामन में
कि मैं तुम्हारे जीवन का बसंत बन जाऊँगी 

कभी बनाना चाहो किसी सफर में मुझे हमसफर 
बस यूँ ही महसूस करना चाहो मुझे..
तो बैठ जाना किसी पीपल के तले
उन पत्तियों की सरसराहट में आहट मेरी ही आएगी
मूंद लेना आंखे अपनी तब
भरी दोपहरी मे मै शीतल छाया बन जाऊँगी। 

कभी किसी उलझन में रहो तो 
सूंघ लेना नीम की नर्म पत्तियों को
कडवी सी लूँगी, मगर सत्य कह कर 
तुम्हें तुम्हारे अंतर्मन से मिलवा जाऊँगी
तुम ले आना सब पीड़ अपनी, मैं सहेज लूँगी
तुम्हारे सब दर्द हर ले जाऊँगी।


थक जाओगे जब कभी चलते चलते 
दुनिया की पथरीली सी राहों पर..
आ जाना...मैं नर्म घास बन, तुम्हारे कदमों में बिछ जाऊँगी
तुम चलोगे नंगे पांव मद्धम मद्धम, 
मैं पोर पोर सहलाऊँगी.! 

कभी यूँ भी होगा किसी रोज़- किसी फुर्सत के पल में
जब तन्हाई तुम्हारी एक ही साथी होगी..जानती हूँ
उस रोज़ तुम सोचोगे मुझे..हाँ! ज़रूर सोचोगे मुझे
जब कोई न होगा आसपास --उस एक पल में --
मैं याद तुम्हे बहुत आऊंगी
ऐसा करना- छू लेना अपने बाग का इक गुलाब
उसकी पंखुड़ियों में छुअन मेरी ही पाओगे
मुस्कुरा देना उस पल में फिर तुम- 
कि मैं बन कर खुशबू- तुम्हारी उंगलियों मे समा जाऊँगी 

इक दिन ऐसा आएगा- 
जब मैं खामोशी ओढ़ लूँगी
तब मेरी बाते याद कर -- तुम बरबस ही मुस्कुराओगे 
कभी आ भी जाएँ आंसू गर मुझे याद कर के
हर बूँद को अपनी हथेलियों में भर लेना--
कि उस सागर में भी मैं ही नज़र आऊंगी 

तेरे आसपास रहूँगी मैं जहाँ भी रहूँ
इक दिन अगर मैं खो भी जाऊँगी- 
बन कर हवा तेरी सांसों में समा जाऊँगी! 


                    शालिनी अग्रवाल
                          जालंधर