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आज अपनी बेटी के """"जन्म दिवस के अवसर पर मैंने बेटियों के लिए चंद पंक्तियां लिखने का प्रयास किया है....""""
"बेटियां न कोई अनमोल रतन है,न ही कोई कोमल बदन है,
वो तो बस उस मां की देह है,
जिसे वो सहेजती बारम्बार
न वो समर्पण भाव है ,
न त्याग का पर्याय है,
वो तो उस पिता की नेह है
जिसे पलकों तले वो रखता हरबार,"
"बेटियां आंखो में भर आई वो पीर है जो ससुराल जाते वक्त बह जाती है,
आंखों में उतर आई वी शुद्ध नीर है जो मर्यादा ओढ़ दोनों स्थान रह जाती है,"
"मेरी बेटी जैसी आपकी बेटी
दोनों चहेती दोनों एकसार हैं,
कहते हैं "" अपनी ही बेटी है
बात जब बेटी करता संसार है,"
"अकेले जन्म नहीं लेती बेटियां साथ संस्कार भी लाती है ,
नारियों के प्रति पुरुषों के मन में उदार व्यवहार भी लाती ,"
"वो पिता वो भाई क्या किसी को छलेगा जो अपनी बहन बेटी का मुख सोचेगा ,
कितने लाड़ से कितने जतन से पाला कैसे कैसे दिया उसे सुख सोचेगा ,"
"कुछ अपवाद व नरभक्षी भी हैं , मानती हूं ," पर सच है बेटियां परिवर्तन लाती हैं
पुरुषों को ही नहीं नारियों को भी बहुत कुछ सिखलाती हैं"
"बेटी पे न कोई आंच आये इस डर से दुश्मनी मिटाती है,
मां सास बनके अपनी बहू को बेटी बनाती है"
"बेटा बेटी दोनों घर की शान मान हैं दोनों एक बराबर
फिर संस्कार देने में भेद कैसा
दोनों को दें सीख एक बराबर"
"बेटी को बेटी ही रहने दें उसे न बदलें
बदलना है तो आइए समाज में अपना नज़रिया बदलें"
... स्वरचित व मौलिक
.... कीर्ति रश्मि नन्द (वाराणसी)

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