एक बार शीशी में बंद इत्र की गंध किसी को पता न चले पर जिन बातों को छिपाया जाता है, वे बातें बहुत बढकर फैलती हैं। एक के कान से दूसरे के कान में जाते जाते बढती जाती हैं।
दातादीन ने तो ठाकुर साहब की इज्जत बचाने की बहुत कोशिश की। पर मजदूरों से कुछ भी नहीं छिप पाया। वैसे भी ठेल से खरीदी पूड़ियों की पैकिंग को कौन नहीं पहचान सकता।
ठाकुर साहब के घर बहुओं में एका नहीं है। दोनों में बहुत झगड़ा होता है। आज तो दातादीन जब खाना लेने हवेली पहुंचा तो हवेली अखाड़ा बनी हुई थी। दोनों बहुएं एक दूसरे की चुटिया खींचकर दूसरे को गिरा गिराकर पीट रहीं थीं। दातादीन तो यह देख भी नहीं पाया। शर्म के मारे चुप निकल गया।इस तरह की कितनी ही बातें लोगों के मध्य घूम रहीं थीं।
वैसे ठाकुर भानुसिंह सहनसील व्यक्ति थे। पर बेफिजूल की बातें कौन सहे और कितना सहे। अनेकों लोगों से उलझते रहे। जानते थे कि इसका कोई सार्थक परिणाम नहीं मिलेगा। फिर भी मन को संतुष्टि मिल रही थी।दूसरों को खूब हड़काने के बाद भी भानु सिंह को लग रहा था कि कुछ छूट रहा है। अभी भी मन को संतुष्टि नहीं मिली। आखिर में उन्हें ध्यान आया।
जोरावर सिंह और नबाब सिंह दोनों अपनी अपनी पत्नियों को मना रहे थे। आज घर में खाना नहीं बना। आदमियों ने तो बाहर की पूड़ियां खा लीं थीं पर दोनों ही औरतें भूखी थी। एक दूसरे को नीचे दिखाने में अक्सर इंसान खुद का ही नुकसान करता है।
" देख दामिनी। तू उससे मुंह ही क्यों लगती है। आखिर उसकी तेरे सामने क्या हैसियत। वैसे भी बड़े घर के लोग छोटों के मुंह नहीं लगते।"
जोरावर सिंह की युक्ति काम करने लगी। सुबह से रूठी दामिनी अब गुस्सा छोडने को तैयार थी। वैसे भी पेट में चूहे कूद ही रहे थे।
दूसरी तरफ नबाब सिंह ने भी कुछ यही युक्ति अपनी पत्नी सुरुचि के साथ चलायी।
" बड़ों से मुंह लगने से क्या फायदा। इस लड़ाई में हमेशा हार छोटे की होती है।"
" वह कैसे।" सुरुचि को यह तर्क हजम नहीं हुआ। वास्तव में तर्क तो कुछ था ही नहीं। औरत को मनाने के लिये छोड़ा गया तीर अब उसे खुद की तरफ आता दिखा।
" अरे। बड़ों से कुछ उल्टा बोल दिया तो लोग छोटे की ही बुराई करते हैं। यही बोलते हैं कि इसमें इतनी भी तमीज नहीं है। "
".हूं ।वह तो है। पर आपकी भाभी के वेदवाक्य ही ऐसे होते हैं कि कोई बोलना न चाहे तो बोल दे। बिना जबाब सुने उन्हें आनंद नहीं आता।"
नबाब सिंह समझ गया कि अब दाव सही जगह लगा। बस थोड़ा सा हथोड़ा और मारना है और फिर परेशानी दूर।
" अब तुम रहने भी दो सुरुचि। हाईकमान की चापलूसी कर एक बार टिकट मिल गयी तो विधायक बन गये। बर्ना भाभी के रिश्तेदारों की जमीनी हकीकत किससे छिपी है। खानदानी रईसी अलग बात है। जो तुम्हारे मायके में हैं।"
दोनों ही तरफ मामला बन गया। दोनों ही स्त्रियां दिन में हुए विवाद को भूलकर शाम का भोजन बनाने की तैयारी करने जा रही थीं। पर विवाद को अभी खत्म नहीं होना था। परिवार की शांति अभी ठाकुर भानुसिंह की संतुष्टि की भेंट चढनी थी।
" कैसे कैसे औरत के गुलाम होते हैं। घर में औरतों के दिमाग तभी खराब होते हैं जब आदमी की ज्यादा ढील हो। संसार में किसी ने अपनी स्त्री को प्रेम किया ही नहीं है। बस प्रेम करने बाले ये दो हमारे सपूत ही पैदा हुए हैं। आखिर स्त्री की इतनी मजाल कि पूरे गांव और समाज में मजाक बनबा दे। कोई बात नहीं। अभी तो कुछ नहीं हुआ। आगे और देखते हैं कि आगे क्या क्या होना है। इस हवेली में हमेशा स्त्रियां पुरुषों की आज्ञा मानतीं आयी हैं। आज दो नालायकों की करनी की गवाही दे रही है। आखिर मैं कब मना करता हूं कि स्त्री को प्रेम मत करो। पर इतना प्रेम कि वह प्रेम ही जहर बन जाये। "
ठाकुर भानुसिंह ने हवेली के आंगन में खड़े होकर जमकर अपनी भड़ास निकाली और फिर बाहर बैठक में चले गये। अब उनको अपने मन में अपूर्व शांति महसूस हो रही थी। अब उन्हें चैन की नींद आयी। नींद में उन्हैं यह पता ही नहीं चला कि उनकी क्रोधपूर्ण वाणी ने दो ठाकुर लड़कों के मन में वीर रस भर दिया था। सचमुच बाबूजी सही कहकर गये हैं। इन स्त्रियों की जब तक अच्छी तरह पूजा न की जाये तब तक उन्हें कुछ समझ नहीं आता। सुबह ठाकुर भानुसिंह को घर अस्त व्यस्त नजर आया। हवेली में रात में दो पतियों द्वारा अपनी पत्नियों पर मर्दानगी दिखाने के काफी साक्ष्य मौजूद थे। इस दृश्य को देखकर भानुसिंह एकदम घबरा गये। उनकी स्थिति दोनों समधियो में से किसी से भी टक्कर लेने की न थी। पहाड़ के सामने ऊंट की क्या बिसात। और जब ऊंट के दोनों तरफ दो पर्वत श्रंखलाएं हों तो फिर तो क्या कहने। पर अब पछलाये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत। वैसे भी सब उन्ही की करनी का परिणाम था। उन्होंने ही ज्यादा बड़े परिवारों की बेटियों को अपनी बहू बनाया था। तो परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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