उमड़ घुमड़ कर आये बदरा,
संग याद पिया की लाये बदरा।
नन्ही बूंदों के चुम्बन से धरती में छाई हरियाली,
खिल उठी प्यार प्रियतम का पाकर ओढ़ी चूनर मतवाली।
बर्षा पाकर उमड़ी नदियां चलदी प्रियतम (सागर)से मिलने को।
तोड़ी है किनारों की मर्यादा आतुर है पिय आलिंगन को।
घनघोर घटा छाई नभ में चम-चम बिजली सी चमकती है,
पिय बिहीन मन डरता मोरा रात्रि काल सी लगती है।
ध्वनि मधुर-मधुर झींगुर दादुर की मन को तनिक न भाती है,
चमके जुगनू जब रातों को तो याद पिया की आती है।
छाए  नभ में काले बदरा दिखते है कभी छुप जाते है,
गर्जन की थाप सुनत मोरा मन मस्त मगन हो जाते है।
चलती है जब पुरवइया तो ठंडी फुहार ले आती है,
सिहर उठा तन बदन प्रिया का जब प्रीतम की याद सताती है।
बागों में छाई बहारें जब भंवरों ने भी गुंजारे किया,
पिय बिन मेरा सूना अँगना भावे मन न सावन न क्वांर पिया।
अखियां तरसे है दर्शन को अब तो आन मिलो सजना,
मन प्रेम का प्यासा है मेरा अब पायल भी चाह रही बजना।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"