"सब खिड़कियां -दरवाजे बंद कर दो
मुझे खुद से रूबरू होने दो "
अब नहीं करना कोई मौन प्रार्थना
मुझे, खुद से खुद को ढूंढने दो !
स्मृति -शेष हैं जो चिह्न सारे,
उन चिह्नों को वक्त की अविरल -धारा में
बह जाने दो......
अब भूल जाने दो यादों के वो लम्हें !
जो जख्म बन रिस रहे प्रति- पल !!
सूख जाने दो इन्हें,
हृदयस्थल की अंतरिम गहराइयों में..
बन जाने दो मेरे अंतस्थल को मरुभूमि !
और इस मृगमरीचिका में मुझे खो जाने दो।
मुझे खुद से खुद को ढूंढने दो,
सब खिड़कियां दरवाजे बंद कर दो।
मुझे अंतस की गहराइयों में उतरने दो,
मन की अनवरत पीड़ा को यहीं दफ़न करने दो!
मन के इस टूटन से मुक्त हो जाने दो,
"सब खिड़कियाँ दरवाजे बंद कर दो
मुझे खुद से रूबरू होने दो "
इस टूटन से मुक्त हो जाने दो....
डॉ पल्लवी कुमारी "पाम "
अनिसाबाद, पटना

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