माँ का आँचल पकड़ कर चली,
थी वो इक नन्ही सी कली।
कली थी गुलाब की सौंदर्य से परिपूर्ण थी,
फ़लक की इश्राक लिए वो चंदा का नूर थी।
तोतली बोली से मन को  रिझाती थी,
कर-कर शरारतें सबको हँसाती थी।
आँगन में छन-छन जब पायल छनकाती थी,
मधुर सी मुस्कान पर माँ बलिहारी जाती थी।
जन्मी थी घर में बजी थी बधाई,
गली और मुहल्ले की मेहरारू थी आई।
सबने फिर आपस में घुसुर-फुसुर लगाई,
बेटा न जना है पहली बार बेटी जन पाई।
मन्द सी मुस्कान लिए द्वारे की ओट से,
माफ कीजो काकी कहूँ बात बड़ी मुँह छोटी से।
बेटा हो या बेटी दोनों समान है,
दोनों से ही स्त्री की पूर्णता की पहिचान है।
होत है जनते बखत पीड़ा समान है,
बेटा हो या बेटी ईश्वर का बरदान है।
सतरंगी धरती सी ख्वाहिश है आसमाँ,
बेटी है मेरी वो मैं हूँ उसकी माँ।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"