आंखों में सपने पलते थे 
  सपनों में हम इतराते थे 
यह उन दिनों की बात है 
जब हम भी मुस्काते थे ।

बचपन के खेल खिलौने थे 
हाथी घोड़े  सब अपने बाराती थे 
यह उन दिनों की बात है जब
गुड़ियों की शादी में शरीक होने
दोस्त सारे बन ठन कर आते थे ।

न कुछ लेना न देना मन भर थाल
एक टुकड़ा इमली का बन जाता पकवान
यह उन दिनों की बात है जब 
नीम के पत्तों से भी स्वादिष्ट व्यंजन बन जाते थे।

न झगड़ा कभी न किसी को जलाया गया
रूठ गई गर नार तो हर सम्भव मनाया गया
यह उन दिनों की बात है जब 
नर नारी का भेद न यारो हमको कराए जाते थे।

आज बहुत है भोग विलास 
आता नहीं पर कुछ भी रास 
एक मुस्कान को तरस रहा अंतर मन
यह उन दिनों की बात है जब 
हम भी खिलखिला कर हंसते गाते थे।