मैं आश लगाए बैठा हूँ,
कब तुमसे एक मुलाकात हो...
क्षिर-प्रेम में डूब रहा हूँ,
बस तुमसे यह मेरी आश लगी...
ना मैं जानु मित्र-प्रेम को,
जो था श्री कृष्ण-सुदामा के बीच...
रच जाऊँ मैं एक-डोर में,
जैसे फूल-पतंग के बीच...
तुम सफ़र के साथी मेरे,
मेरे प्रेम की दामन को थामें...
मैं मुसाफ़िर चला हूँ गाने,
राग 'सदाबहार' की लुफ्त उठाने...
वो मेरे हमराही,
तुम मेरा हाथ थामें रखना...
मर भी किसी एक दिवस तो,
अपना साथी बनाये रखना...
✍️ विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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