ये जिन्दगी बिन तेरे अब, 
क्युं अधूरी सी लगती है,
ये कौन सी तलाश थी जो,
हुई तुम पर पूरी सी लगती है।

ये नयना ये काजल, 
ये जुल्फें ये लहराता आंचल,
ये सब बेकार की बातें भी, 
अब बहुत जरुरी सी लगती है।

दिल के बहुत अंदर घर अब,
कर गई है नजरों के रास्ते,
ये जिस्मों की दुरी भी अब,
क्यों नहीं दुरी सी लगती है।

रस्मों रिवाजों के भंवर से,
आज बहुत दूर निकल आये,
तेरे पहलु में हर रात रोशन,
हर शाम सिन्दूरी सी लगती है।

एक नाज था हमें जो खुद पर,
बस टूट ही गया तुमसे मिलकर,
गाफिल ना हुये नशे में कभी जो,
तेरी याद भी सुरुरी सी लगती है।

ये जिन्दगी बिन तेरे अब, 
क्युं अधूरी सी लगती है,
ये कौन सी तलाश थी जो, 
हुई तुम पर पूरी सी लगती है।


आपका #रंजनलाल#
⚘⚘🙏🙏⚘⚘