इस संसार में कुछ भी किसी को आसानी ने नहीं मिलता। सपने आसानी से पूरे नहीं होते। बहुत बार मनुष्य जिसे अपने सपने का मार्गदर्शक समझता है, वही उन सपनों के मध्य खड़ा मिलता है। वैसे सच्चा प्रेम वही है जिसमें कोई अपने प्रेमी या प्रेमिका के सपनों की खातिर खुद का प्रेम मिटा दे। जहाँ खुद के ही सपने पूरे करना मुख्य ध्येय हो, वहाँ प्रेम जैसी उच्च मान्यताएं तो नहीं होतीं। खुद की खुशी के लिये जीना कभी भी प्रेम नहीं है।
इससे बहुत आगे प्रेम केवल किसी नवयुवक और नवयुवती के मध्य का आकर्षण नहीं होता है। प्रेम के अनेकों रूप होते हैं। माता, पिता, भाई से किसी कन्या को जो प्रेम होता है, किसी नवयुवक से प्रेम उस प्रेम की बराबरी नहीं कर सकता है। जिन बुजुर्गों के संरक्षण में बचपन से लेकर युवावस्था तक की यात्रा तय करते हैं, उन्हें दुखी कर प्रेम पाना क्या वास्तव में प्रेम पाना है। इस विषय में सभी की धारणा अलग अलग हो सकती है। पर लक्ष्मी की धारणा वही है जो एक संस्कारी भारतीय कन्या की होती है।
लक्ष्मी का जन्म दिन का आयोजन संपन्न हो गया। उसके बाद लक्ष्मी को घर में कुछ बदला बदला लगने लगा। बातों बातों में सुलक्षणा और रुक्मिणी लक्ष्मी से सहपाठियों की बात चलाने लगीं। खासकर किस किस छात्र से मित्रता है। पर लक्ष्मी कुछ भी समझ नहीं पाती। उसे अनुमान ही नहीं चला कि उसके मन को टटोला जा रहा है। उसके जीवन का फैसला करने का विचार किया जा रहा है।
लक्ष्मी की मित्रता लड़कों में अभी तक केवल विशाल से ही हुई थी। जो उसके मन को भाया है, उससे तो कभी बात भी नहीं हुई। ऐसे में यदि बिना घुमा फिराकर लक्ष्मी से सीधे सीधे भी पूछा जाये तो भी लक्ष्मी कुछ उत्तर नहीं दे सकती थी। लक्ष्मी को इंतजार था, विशाल के फिर से मिलने का। ताकि इस बार उसे अपने मन के राज बता सके। उसे विशाल पर पूर्ण विश्वास था कि वह उसकी मदद जरूर करेगा।
दूसरी तरफ विशाल को इंतजार था कि लक्ष्मी के घर से कब हाॅ की बात आये। जब उसके पिता ने उससे लक्ष्मी के बारे में पूछा था, वह तभी समझ गया कि उस दिन उसे पार्टी में लेकर जाना एक प्लान था। अब उसे अपना सप्न पूर्ण होता नजर आ रहा था। पर प्रश्न फिर वहीं आ खड़ा होता है। क्या किसी प्रेमी का खुद का स्वप्न ही उसका स्वप्न होता है। प्रेमी तो जिससे प्रेम करता है, उसके स्वप्नों को अपना स्वप्न बना लेता है।
इस तरह कई दिन बीत गये। आखिर सुदर्शन जी ने अपनी पत्नी सुलक्षणा और अपनी मुंहबोली बहन रुक्मिणी से लक्ष्मी के मन की बात पूछी तो दोनों का इस विषय में परिणाम अलग अलग था। सुलक्षणा जी के अनुसार लक्ष्मी मन ही मन विशाल को पसंद करती हैं। लक्ष्मी विशाल पर पूर्ण विश्वास करती है। विश्वास ही प्रेम का दूसरा रूप है।
पर रुक्मिणी की राय कुछ अलग थी। हालांकि उसके पास अपनी राय को सही बताने का कोई आधार नहीं था। निश्चित ही लक्ष्मी और विशाल के मध्य अच्छी मित्रता रही है। लक्ष्मी विशाल पर पूर्ण विश्वास भी करती है। पर लगता है कि उसके मन में कोई तो बसा है। जो निश्चित विशाल तो नहीं है। वह कौन है, कैसा है, लक्ष्मी के योग्य है या नहीं, इन बातों पर गहराई से विचार करना चाहिये। केवल धनी परिवार में विवाह करना ही बेटी की खुशी नहीं हो सकती है। फिर लक्ष्मी बिटिया के लिये तो धन का ज्यादा महत्व ही नहीं है।
माना जाता है कि माॅ अपनी संतान के स्वप्न भी पढ लेती है। पर इस विषय में लक्ष्मी की माता कुछ पिछड़ रही थीं। शायद पालन करने बाली भी माता होती है। हालांकि लक्ष्मी को जन्म किसने दिया है, यह किसी को नहीं मालूम। पर रुक्मिणी ने भी लक्ष्मी को बचपन से ही अपनी बेटी मानकर पाला है। आज भी उसके हक को घर में मान दिया जाता है। लक्ष्मी का विवाह विशाल से करना चाहिये या नहीं, इस विषय में भी उससे राय मांगी गयी है। तथा लक्ष्मी का पालन करती आयी घर की एक नौकरानी उसके मन में छिपे उसके स्वप्न को ज्यादा अच्छी तरह पढ रही है।
आखिर सुदर्शन ने लक्ष्मी से सीधे सीधे बात करने का निश्चय किया। पुत्रियाँ अक्सर पिता से संकोच करती हैं। फिर भी बात तो करनी होगी। आखिर बेटी के भविष्य का प्रश्न है।
आज फिर लक्ष्मी को सुबह जगने में देर हो गयी। और जब वह जगी तो उसने अपने कक्ष में अपने पिता, माता और रुक्मिणी बूआ तीनों को पाया। तीनों न जाने कब से उसके जगने की प्रतीक्षा कर रहे थे। आज सुलक्षणा जी ने लक्ष्मी को उठाया नहीं।
" आज इतना बक्त हो गया। मम्मा। आपने मुझे जगाया क्यों नहीं।"
" वह इसलिये क्योंकि हम चाहते हैं कि हमारी बेटी जिन स्वप्नों को देख रही है,हम उन्हें पूर्ण कर सकें।" उत्तर सुलक्षणा जी के बजाय सुदर्शन जी ने दिया। सुदर्शन लक्ष्मी के बहुत पास बैठ गये।
" बेटी। आखिर कौन है तुम्हारे सपनों में। जिसके सपनों में तुम खोयी रहती हो। "
लक्ष्मी अवाक रह गयी। कुछ भी बताने में खुद को असमर्थ पा रही थी।
" कहीं वह विशाल तो नहीं। देखो बेटी। अब हम एक बेटी के माता पिता का सबसे कठिन फर्ज पूरा करना चाहते हैं। उसमें तुम्हारा हित चाहते हैं। तुम्हारी इच्छा हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। हम विशाल से तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं। विशाल के घर बालों को तुम्हारी आगे पढाई और नौकरी करने में दिक्कत भी नहीं है। जाने पहचाने लोग हैं। पर निर्णय तुम्हारी इच्छा पर ही होगा। "
इस बार लक्ष्मी ज्यादा देर तक चुप रही। एक अपरिचित से प्रेम को माता पिता के प्रेम से तौलने लगी। उसे लगा ही नहीं कि उसका अपरिचित युवक से प्रेम माता पिता के प्रेम की बराबरी भी कर पा रहा है। जैसे तराजू के एक पलड़े में बहुत भारी और दूसरे पलड़े में बहुत हलकी वस्तु रखी जाये तो हल्की वस्तु का पलड़ा ऊपर उठ जाता है। इस समय लक्ष्मी अपने मन और माता पिता के मन को तौल रही थी। माता पिता का मन विशाल है। जिसके सामने उसे खुद के मन का कोई मोल नहीं लगा।
" पिता जी। आपने मेरे लिये जो सोचा है, वह अच्छा ही सोचा है।"
बस इतना बोलकर लक्ष्मी उठकर दूसरे कमरे में भाग गयी। इस घटना को सुदर्शन और सुलक्षणा बेटी का माता पिता के प्रति संकोच समझ रहे थे। वहीं रुक्मिणी को लग रहा था कि शायद लक्ष्मी अपना चेहरे की उदासी छिपाने एकांत में चली गयी है। एक दूसरे कमरे में लक्ष्मी अपनी आंखों से आंसू पोंछ रही थी। माता पिता की खुशियों के लिये उसके दुख का भी कोई मोल नहीं है। अब लक्ष्मी अपनी आंखों से आंसू नहीं बहाएगी। पर क्या वास्तव में यह संभव है कि लक्ष्मी अपने प्रेम को पूरी तरह भूल जाये। उसका प्रेमी अब उसके सपनों में न आये। शायद नहीं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

0 टिप्पणियाँ