कई बरसों बाद आया जब मैं अपने गांव में
क्यूं दिखती नही है अब रौनक मेरे गांव में

सूनी है चौपालें, सूनी सूनी हैं गलियां
सूने हैं पनघट, और सूनी पगडंडियां
नही पड़ते झूले अब आमों के बाग में
क्यूं दिखती नहीं है अब रौनक मेरे गांव में

न भोली सी गोरी है, न घाघरा चोली है
लगता फैशन में खो गई, अब मीठी बोली है
न खनके चूड़ियां हाथों में अब न पायल पांव में
क्यूं दिखती नही है अब रौनक मेरे गांव में

शहर गए बेटे का तकती रस्ता बूढ़ी आँखे, 
लंबे अरसे से जिसके न फोन ,न खत आते
माँ बाप भुला बैठा, शहर की शोहरत के चाव में
क्यूं दिखती नही है अब रौनक मेरे गांव में

न गिल्ली डंडा और न पतंग आसमान में
न बिजली न शिक्षा है, सब सुनसान है
झूठे नेताओं ने भी इन्हें छला है चुनाव में
क्यूं  दिखती नही है अब रौनक मेरे गांव में



                ✍🏻प्रीति ताम्रकार 
                     जबलपुर(मप्र)