छुक-छुक करती हुई ट्रेन जैसे ही रेलवे स्टेशन पर रुकी,
मेरी नजरें अनायास ही एक मासूम पर जा टिकी।
मासूम सा वो चेहरा बेहद ही सुरीली आवाज में गाता था,
हाथों की उंगलियों को पत्थर की सीपी पर नचाता था।
स्टेशन से ट्रेन के खिसकते ही वो एक झटके से चढ़ आया,
फिर उसने अपने सुरीले कंठ से सबको रिझाया।
सुनकर उसकी मीठी आवाज को सबने खूब वाह-वाह किया,
देख कर उसकी टूटी सी कटोरी को खिड़की का रुख किया।
कुछ पाने की आशा से वह मेरे पास चला आया,
मैंने भी मुस्काते हुए दस का नोट बढ़ाया।
बहुत अच्छा गाते हो संगीत का ऑडिशन कभी क्यों नही दिया है,
साब ऑडिशन तो बड़े लोग देते हम गरीबों के लिए तो खुदा ने रेलवे स्टेशन ही बनाया है।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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