विमला ने बहुत समझाया ,पर संतो को अपने फैसले से डिगा नहीं पाई।
जब शाम को राधेलाल लौटा ,तो विमला ने सारी बात बताई ।राधेलाल ने हामी भरी ।
उसके एक मित्र ने बताया कि यहीं पास में तिमारपुर में इंदिरा बस्ती है ,वहीं एक घर खाली है,अगर संतो रह सके तो सस्ते में दिलवा दूं।
तुमलोग से ज्यादा दूर भी नहीं रहेगी ।कोई परेशानी होगी तो ,मदद भी कर देना।
ये सुझाव राधेलाल को पसंद आया।उसने विमला और संतो से बात की।
सब लोग बस्ती में गए।
सुबह होते सभी वहां गए।वहां का मंजर देख राधेलाल ने मना कर दिया,पर संतो ने कहा मैं रह लूंगी भईया।
सवेरे जब वो लोग गए थे तब नल पर पानी के लिए लड़ाई हो रही थी।
सार्वजनिक शौचालय के पास लाइन लगी थी।
पर संतो को इन सभी परिस्थितियों से कोई ऐतराज नहीं था।उसका एक ही मकसद था,अपने दुलारे को अच्छी शिक्षा देकर बड़ा आदमी बनाना।
बस्ती में सुबह सुबह लड़ाई झगड़ा रोजमर्रा का काम था।
उसके बाद सब काम पर चले जाते थे ,तो पूरा दिन शांति का माहौल रहता।
संतो अपने घर कहे,झोपड़ी कहे , चाल कहे ,जो भी पाठक समझे ,में आ गई । कुछ भी घरेलू सामान उसके पास नहीं था।कुछ सामान विमला ने गृहस्थी के दे दिए थे।
राधेलाल ने बैंक में खाता खुलवा दिया। संतो ने कुछ गहने बेच पैसे बैंक में फिक्स डिपोजिट करवा दिया ,राधे की उच्च शिक्षा के लिए।
संतो कुछ पैसे से एक सिलाई मशीन ले आई ।आस पास के घरों में जिसे वह जानती थी,वहां बता दिया कि किसी को कपड़े की सिलाई करवानी हो तो ,वो सिल देगी।
उसके हाथ में जादू था ,धीरे धीरे लोग उससे कपड़ा सिलवाने लगे,कुछ आमदनी होने लगी ।घर का खर्च चलने लगा।
अकेली औरत पर जमाने की गंदी नजर भी होती है।
बस्ती में कुछ आवारा,मवाली सड़क छाप गुंडे रास्ते में बैठ कैरम खेलते और सामने से जाती लड़कियों,जवान महिलाओं पर फब्तियां कसते।
वे लोग संतो को भी कुछ न कुछ कह कर छेड़ते ।
पहले वो अनसुना कर आगे बढ़ जाती थी।लेकिन एक दिन उनमें से एक ने उसका हाथ पकड़ लिया ,उस समय संतो का खून उबल उठा ,एक सीधी साधी संतो से , वह रणचंडी बन गई ,उसने पास से एक डंडा उठाया ,और उन लड़कों को खूब धोया ।
फिर क्या था ,पूरी बस्ती के लोग उन गुंडे मवालियों पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया।
कुछ जवान लड़कियां और स्त्रियां भी उन सबकी छींटाकशी से आहत थीं,लेकिन डर से हिम्मत नहीं कर पाती थी।उस दिन संतो की हिम्मत ने उन्हें भी हिम्मत दी।
विमला और राधेलाल ने जब यह खबर सुनी तो दौड़े दौड़े आए ।
विमला ने कहा _संतो अब तो चल मेरे साथ ।
संतो ने कहा _भाभी,आप लोगों ने मुझे ऐसे वक्त पर सहारा दिया ,जब मैं कुछ भी नहीं जानती थी शहर को ,और चालबाज ,समाज में छुपे भेड़ियों के बारे में ।
भाभी आप चाहती हैं कि मेरा उद्देश्य पूरा हो तो मुझे अपनी लड़ाई खुद लड़ने दीजिए।
दुलारे को भी कठिन जीवन देखना है ,जानना है।
दुलारे अभी अभी खेल कर आया था,राधेलाल,और विमला को देख उनसे मामा ,मामी कह लिपट गया।उन्होंने उसे खूब प्यार किया ,और उसकी मनपसंद मिठाई दी।फिर संतो और दुलारे को फिर आने को कह चले गए।
अब सबकी नज़र में संतो का सम्मान बढ़ गया था। सब उसका ख्याल रखते ,विशेषकर दुखिया चाची संतो के दुख ,सुख में पहले पहुंचती थी।
ये सीधी साधी संतो को ,समय ने बहुत कुछ सिखा दिया था।
बस्ती नेताओं का वोट बैंक था,चुनाव के समय बड़े बड़े नेता वोट के लिए चुनावी टूरिज्म करने इस बस्ती में आते थे।
बस्ती के लोगों को कुछ लुभावने वायदों की चाशनी घोल कर नेता पिला कर 5 सालों के लिए अलविदा कह जाते।
संतो ने बस्ती वालों से मिल कर अपने हितों की बातें इन नेताओं के सामने उठाने कही,नहीं तो चुनाव का बहिष्कार करें बस्ती वाले।
संतो की मेहनत रंग लाई ,बस्ती वालों ने उसकी बात समझी।एक नेता ने तो उसकी बस्ती गोद ली।बेहतर सुविधाएं मिलने लगी बस्ती में।
दिन,महीने ,साल बीत रहे थे।संतो ने दुलारे की पढ़ाई में कोई कसर नहीं रखी थी ।अच्छे स्कूल से लेकर कॉलेज तक का फासला उसने अच्छे नंबरों से तय किया था।
दुलारे का एक मकसद था आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण करना।वह मां के संघर्षों का शुरू से साक्षी रहा।उसने अपने पिता को नहीं देखा था,देखा था तो सिर्फ अपनी मां ,वही उसकी दुनिया थी ,वही उसकी भगवान।
वह दुनिया की हर खुशी अपने मां के कदमों में देना चाहता था।
उसने मां को चुपचाप अंधेरे में रोते देखा था, पूछने पर आंख में कुछ गिर गया ,बहाना बनाती देती थी ।
मां की आंखें लगातार सिलाई करते कमजोर हो रही थी,इसलिए वह पार्ट टाइम ट्यूशन पढ़ा कर ,मां से काम नहीं करने को कहता।
आज शाम दुलारे की आईएएस परीक्षा में चयन होने की बधाई देने विमला और राधेलाल बधाई देने आए थे।आज संतो विमला से गले लग कर बहुत रोई ।
इतने सालों से वह छुप छुप कर रोती थी,किसी को अपना गम नहीं दिखाती ,आज उसके आंसुओं का सैलाब बह निकला ।
ये खुशी के आंसू थे,जो सबके दिल भिगो रहे थे।
राधेलाल ने कहा ,अब इसे ट्रेनिंग में जाना होगा,तो तुम अकेली रहोगी ,अब तो चली आओ अपने मायके ।
कृष्णा भी तुम्हें देख खुश हो जाएगा ,इस समय घर आया है।
भैया उसे भी लिवा लाते _संतो ने कहा।
अरे बैंगलोर से आते ही घर में कहां रहता है ,स्कूल के दोस्तों से मिलने निकल जाता है।
अगले साल तक मैं भी रिटायर कर जाऊंगा, फिर मैं और विमला उसी के साथ बंगलौर जा कर रहेंगे_राधेलाल ने कहा।
ये तो बहुत अच्छी बात है,भैया_संतो ने कहा।
अच्छा तो हमलोग चलते हैं,दुलारे के ट्रेनिंग के बाद तू चली आना या ,मुझे बता देना ,मैं तुम्हे लिवा ले जाऊंगा।
ठीक है भैया _संतो ने कहा।
नियत तिथि पर दुलारे , ट्रेनिंग के लिए मसूरी के लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के लिए रवाना हो गया।
आज पहली बार वो अकेली थी,घर काटने को दौड़ रहा था।पड़ोसी ,दुखिया चाची सब मिल कर चले गए ,सब खुश थे दुलारे के लिए ,लेकिन संतो यहां से चली जाएगी इसका गम भी था।
कहते हैं,न जिंदगी में किसी चीज को पाने के लिए हम पूरा अपना जोर लगा देते हैं,जब वो चीज मिलती है तो भी क्यों हम खुश नहीं हो पाते,आज संतो को भी यही अनुभूति हो रही थी।उसके जीवन में एक रिक्तता ,एक ठहराव सा आ गया था।
क्रमशः

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